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पागल मन बके दनादन

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अंतहीन गिनती

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तुम गिनते हो सुख दुःख की सिलवटें हर दिन
और वो बूढा है एक जो हर दिन
जीने की फ़क़त मोहलतें गिनता है

तुम गिनते हो जमा की गयी दौलतें हर दिन
और वो गरीब है एक जो हर दिन
अपनी कभी न पूरा होने वाली जरूरतें गिनता है

तुम गिनते हो अपने खाने की लुत्फदोजियाँ हर दिन
और वो भूखा है एक जो हर दिन
कूड़े में फेंके झूठन गिनता है

तुम गिनते हो अपने हँसते बच्चों की किलकारियां हर दिन
और वो बाप है एक जो हर दिन
अपने भूख से कलश्ते बच्चे की सिसकियाँ गिनता है

तुम गिनते हो किसी शोख बाला के आँखों का आमंत्रण हर दिन
और वो एक अभागा है जो हर दिन
लोगों की नज़रों की उपेक्षाएं गिनता है

ताज्जुब है कि न कभी तुम्हारी गिनती ख़त्म होती है
न कभी उसकी गिनती ख़त्म होती है

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
January 19, 2013

बहुत खूब.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 17, 2013

अनवरत प्रक्रिया बधाई आदरणीय पवन जी सादर


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