Laptop wala Soofi

पागल मन बके दनादन

25 Posts

496 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 10106 postid : 78

एक सनसनीखेज़ खबर

  • SocialTwist Tell-a-Friend

 BREAKING NEWS : खबर है कि एक रईसजादे के बाग से आम तोड़ रहे बच्चे को रईसजादे ने गोली मार दी : 

 

दृश्य : जेठ की अनमनी अलसाई दुपहरी ….दूर कोई ताड़ी के मत्त में चूर ढोल की थाप पे रसिया गा रहा है ….पुरबैय्या की लोच में उसका स्वरालाप इधर उधर बहता जा रहा है ..कभी तीव्र कभी मंद…कभी श्रुति सीमाओं के पार….माँ बरौठे पे बीचे खाट पे अधलेटी हाथ में पंखा लिए ऊँघ रही है….गोलू और मोलू वहां बैठे पहाडा याद कर रहे हैं -पंद्रह के पंद्रह ,पंद्रह दुनी तीस ,तियो पैंतालिस…पास हीं ऊँचे परकोटों के पार सघन वन-कुंज से आम के खट्टे -मीठे बौरों के झुरमुट में छिपी कोयल अपनी कूक से उन्हें  लगातार आमत्रण दे रही है की – हे बाल नवल आओ ,हे चपल चंचल आओ परकोटों के पार इस कानन कुंज में ,आओ दुपहरी के गुमसुम सन्नाटों को तोड़ने में मेरा साथ दो…मोलू जिसके पहाड़े कि लयबद्धता कोयल के आमंत्रण से टूटने लगी है ,पहाडा रटना बंद कर अपने भाई गोलू से कहता है – चल न भाई चल उस परकोटे के पार उस सघन वन कुंज चलते हैं और आम के दरख्तों पे चढ़ कर खट्टे मीठे बौरे तोड़ते हैं ….गोलू- नहीं माँ कहती है कि किसी के बाग में जाकर आम तोडना महा-अपराध है ..मौत कि सजा मिलती है ….मोलू -ये मौत क्या होती है ? गोलू निरुत्तर रहता है ..क्यूंकि उसे इसका जबाब नहीं पता …मोलू गोलू को निरुत्तर देख चहकता हुआ कहता है -तू मुझे उल्लू बना रहा है ..तूझे बैठना है तो बैठ मैं जाता हूँ ..यह कह मोलू दबे पांव वहां से चल पड़ता है परकोटों के पार उस आम के बाग़ की तरफ

 

 

बच्चे भला दीवारों की रस्मे कहाँ मानते हैं

आसमां के परिंदे सा हर सदद लांघते हैं

 

कभी खट्टे मीठे अमौलियों के लिए

कभी रंग बिरंगी तितलियों के लिए

कभी यूं हीं परकोटों के पार का

अनदेखा मंज़र देखने के लिए,बच्चे

दीवारों पे चढ़कर उस ओर झाकते हैं

 

बच्चे भला दीवारों की रस्मे कहाँ मानते हैं

आसमां के परिंदे सा हर सदद लांघते हैं

 

प़र एक रिंदा-ए-बलानोश रहता है उस पार

गुरुरे-ज़र में डूबा ,लिए बारूदी हथियार

और भेद देता है सीना उनका

जो उसके निजाम में खलल डालते हैं

यह बात ये अबोध बच्चे कहाँ जानते हैं 

 

बच्चे भला दीवारों की रस्मे कहाँ मानते हैं

आसमां के परिंदे सा हर सदद लांघते हैं

 

दृश्य : मोलू का मृत शरीर उसके माँ की गोद में निढाल पड़ा है और उसकी माँ अपने दिल के टुकड़े के मृत शरीर को देख छाती पीट पीट कर  प्रलाप कर रही है  :

 

यह कैसे हो सका कि जब

पिछले बसंत की हरितिमायें

अब भी शाख पे ,

झूमते अमराइयों के संग

बसंती अब भी मंज़रों के

यौवानायाम भुना रही

कि दस्तक के कूक

कोकिलों के अभी थमे नहीं ,

भंवरों को झुण्ड को सरसों

अब भी लुभा रही;

फागुनी गीत के

उच्छवासों का कम्पन

अब भी शेष ,

शेष अब भी

उत्सवों के पहनावे का

ताना बाना

कैसे समय से पहले

तरुणायी प़र हावी होती पतझड़

तुम्हारे ज़िन्दगी को

ठूंठ बना कर चली गयी

 

   ***

कल्पनाओं का पंख लगा

तुम्हारा अज्यमितिय उड़ान

ब्योम के विपुलताओं में

छलांगा था

प़र चूक गए तुम

अपने गणना में

जब यथार्थ के पटल प़र

तुम पटके गए

प्रयोसं के चंद फर्लांग मात्र

चलने प़र

 

BREAKING NEWS :खबर है कि एक डाक्टर पैसे के एवज़ में लड़की की भ्रूण-हत्या कर साक्ष्य मिटाने के लिए भ्रूण अपने पालतू कुत्ते को खिला दिया करता था

 

डाक्टर तुम तो एक पराये हो …

निरमोही पुरुषत्व के नुमाए हो

नहीं खलता इतना जब तुम मुझे

अपने कुत्ते का ग्रास बनाते हो ;

मेरे धड़कते वजूद को

एक निशक्त लाश बनाते हो

पर माँ !…माँ तो खुद एक

नारी है ……

नारी होने की व्यथा उसने

खूब गुजारी है

फिर वह कैसे मुझे बोझ समझ

मेरे नारीत्व का उपहास उड़ाती है ?

कैसे मेरे धमनियों में धमक रहे

मेरे रक्त को गटर में बहाती है ?

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 4.71 out of 5)
Loading ... Loading ...

51 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

May 26, 2012

मुझे मत मरो मेरा क्या कसूर है………. http://satyaprakash.jagranjunction.com/2012/05/25/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%9D%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B8/#comment-१२ किसी भी धर्म के लोग हो उन्‍हे आगे आकर इसका विरोध करना चाहिए और सरकार से भी निवेदन करना चाहिए कि इस तरह के कार्यक्रमो पर रोक लगायी जाय, मै आप सभी का आग्रह करना चाहता हुँ कि आप निम्‍न माबाईल न0 फोन कर इसे राकने का आग्रह करे जिलाधिकारी गोरखपुर 9454417544 आयुक्‍त गोरखपुर 9454417500 एस एस पी गोरखपुर 945440273 आई जी गोरखपुर 9454400209 एस पी आरए 9454401015 योगी आदित्‍यनाथ सांसद गोरखपुर 0551-2255454, 53

sadhna srivastava के द्वारा
May 26, 2012

क्या दादा ये क्या बात हुई…… आप अगर अपनी itniiiiiiiiii अच्छी कवितायेँ कमेंट्स के रूप में लिखेंगे तो हम तो खुल कर तारीफ़ भी नहीं कर पाएंगे……

    pawansrivastava के द्वारा
    May 26, 2012

    हा हा हा :) :)

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 25, 2012

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है पेज 40-41 में .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    महिमा जी बहुत साहसिक और काबिले तारीफ कदम आपका …..हम आपके साथ हैं ….किसी और के मेहनत को चुरा कर खुद को श्रेय देना हमारे फिल्म इंडस्ट्री में तो बहुतायत में होता है पर अब साहित्यिक क्षेत्र में भी ….मुझे ताज्जुब होता है ऐसे लोगों की बेशर्मी पे .

चन्दन राय के द्वारा
May 25, 2012

पवन जी , बच्चे भला दीवारों की रस्मे कहाँ मानते हैं आसमां के परिंदे सा हर सदद लांघते हैं , यह कैसे हो सका कि जब सचमुच बच्चे और बचपन हर बनावट से दूर पाक साफ़ मूरत होते हैं —————————————————————————————————————————————————————————————————————————————!!!!!!! खबर है कि एक डाक्टर पैसे के एवज़ में लड़की की भ्रूण-हत्या कर साक्ष्य मिटाने के लिए भ्रूण अपने पालतू कुत्ते को खिला दिया करता था —————————————————————————————————————————————————————————————————————————————!!!!!!! जितना कहूंगा कम होगा

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    चन्दन जी सच कहा आपने ….मैं तो कहूँगा की हर इन्सान को ऊपर वाले से यह दूआ मांगनी चाहिए कि उसके बचपन का निर्दोषपन सतत विद्यमान रहे ..अगर ऐसा हो जाये तो ये दुनिया बहुत खूबसूरत हो जाएगी

krishnashri के द्वारा
May 25, 2012

स्नेही पवन जी , सादर , इस गर्मी के मौसम में मंच की गर्मी के कारण मंच से दूर रहा . दुर्भाग्यवश आपकी इतनी सुन्दर भाव प्रधान रचनाएँ पढ़ नहीं सका . मेल पर आपका आमंत्रण मिला धन्यवाद . चारो चार रंग में रंगी सुन्दर भावों से युक्त कविता पढ़ कर लगा जैसे ये मेरे ही भाव हों .सफल प्रस्तुति हेतु बधाई .

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    आदरणीय कृष्ण श्री जी ,सदर नमन ! प्रचंड गर्मी में हीं शुकूंकुन शीतल बयार की सबसे ज्यादा ज़रुरत होती है और आप है कि छुट्टी पे चले गए थे …..आपका आना बहुत हीं राहत आफजाई है ..बहुत बहुत शुक्रिया

yogi sarswat के द्वारा
May 25, 2012

खबर है कि एक डाक्टर पैसे के एवज़ में लड़की की भ्रूण-हत्या कर साक्ष्य मिटाने के लिए भ्रूण अपने पालतू कुत्ते को खिला दिया करता था ! मार्मिक , दिल को छू लेने वाले शब्द !

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    धन्यवाद योगी जी

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
May 25, 2012

क्या मस्त लिखते हो गुरु. दिल बाग-बाग हो जाता है. क्या ताना-बाना बुनते हो. हर प्रस्तुति शानदार. बुरा न मानना भाई….कभी-कभी रस्क भी होने लगता है.

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    अजय जी ! आपको है रश्क मुझसे ये आप कहते हो आपकी तो इस अदा में भी मुझे मुहब्बत दिखती है

May 25, 2012

बच्चे भला दीवारों की रस्मे कहाँ मानते हैं आसमां के परिंदे सा हर सदद लांघते हैं ……………………..

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    एक और है जो दीवारों की रस्मे नहीं मानता

D33P के द्वारा
May 25, 2012

पवन जी नमस्कार स्वीकार करे …… दिल को छु लिया ……..बहुत मार्मिक शब्द

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया दीप्ती जी

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 24, 2012

आदरणीय पवन जी, नमस्कार खबर माँ बड़ी आग है……………… गहराई में डूबी हुई लेखनी आपकी ………..लाजवाब पकड़ और पूर्ण संवेदना विचारशील लेख के लिए बधाई

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    आनंद जी आप तो मेरे छोटे से प्यारे और विशिष्ट मेहमान हैं …..आपका तो खास शुक्रिया

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    दादा आज मैं आपको अपना गुरु भी बनाना चाहती हूँ… I can learn so many things from you.. मुझे आपकी हर एक बात से प्यार टपकता हुआ महसूस होता है……

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    अरे साधना हम कहा इस नवाजिश के काबिल …फिर कहूँगा ‘Beauty lies in the eyes of beholder’

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    काश ऐसा होता……

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    साधना ऐसा हीं है

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    पवन जी आम के मौसम में आम आदमी को आम ही रहने दीजिये ………….आपकी लेखनी के आगे हमारी सोच बहुत पीछे रह जाती है……….कोशिश रहेगी कुछ अच्छा लिख आप के आस पास ठहरने की धन्वाद

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    आनंद जी ! अपने एक शेर के ज़रिये आपकी बात का जबाब देना चाहूँगा जिसके वजूद में रह कर खुद खूबियाँ भी नाज़ करती हों क्या नुमाए-शराफत है कि वह भी मरहबा कहता है

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 25, 2012

    बहुत खूब…………….

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 26, 2012

    अब तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है….. you are biased.

    pawansrivastava के द्वारा
    May 26, 2012

    Ya I am biased toward u …as would be any brother toward his sister.

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 26, 2012

    :) :) :) Veryyyyyy intelligent….. Dada i have copied your two poems from Chandan ji’s blog. देखिये ज़रा ये पकिया बहुत ज्यादा पटर पटर कर रहा है…. इसको ५० उठक बैठक करवा दीजिये…. ठीक हो जायेगा…. :)

अजय कुमार झा के द्वारा
May 24, 2012

खबरों पर ऐसी प्रतक्रिया ने तो झकझोर कर रख दिया । विचारोत्तेजक पोस्ट । बहुत ही बेहतरीन

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    अजय जी आपको पसंद आया इसके लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 24, 2012

पवन जी, सादर- बहुत ही करुणामयी नजारा दिखलाया आपने. वास्तव में बचपन नहीं जानता की सरहदें क्या होती है. सीधा दिल पर बार करता हुआ लेख व कविता. कन्या भ्रूण की अंतिम कविता अत्यंत सराहनीय है. साधुवाद !

    pawansrivastava के द्वारा
    May 25, 2012

    मैंने तो बस अपने अंतर-निहित दर्द को शब्दों में नुमा कर दिया पर हनीफ साहब आपके सैय्याद/कफस वाले गजल की बात हीं कुछ और है .

dineshaastik के द्वारा
May 24, 2012

पवनजी, अंतिम  कविता बहुत ही प्रभावशाली, उस  अजन्मी बच्ची के अनुत्तरित प्रश्न उथल  पुथल  कर रहें हैं मस्तिष्क में।

    jlsingh के द्वारा
    May 24, 2012

    सहमत! 

    pawansrivastava के द्वारा
    May 24, 2012

    दिनेश जी हिरदय से आभार

    pawansrivastava के द्वारा
    May 24, 2012

    सिंह साहब शुक्रिया

vikramjitsingh के द्वारा
May 23, 2012

पवन जी…..नमस्कार… आपकी रचना यथार्थ के बहुत करीब है…. दिल को छू गयी……. सादर…..

    pawansrivastava के द्वारा
    May 23, 2012

    तारीफ के लिए शुक्रिया विक्रमजीत जी

haribol के द्वारा
May 23, 2012

एक जाता है तो आता है जहां में दूसरा…उसकी महफ़िल का कभी खाली मकाँ होता नहीं. वही है… वही है… सिर्फ बांस के ऊपर की हांडी बदल गई है. कुछ दल्लों के रहते यहाँ किसी को दाना पानी की कमी नहीं होगी.

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 24, 2012

    कही haribol कही bolhari …. कितने नामो से आप विचरण कर रहे हैं….. और क्यों भगवान् का नाम ख़राब कर रहे हैं…… कोई धांसू नाम रख कर अपनी योग्यता दिखाइए…..

sinsera के द्वारा
May 23, 2012

पवन जी नमस्कार , जिस तरह दुखते हुए फोड़े को ठीक करने के लिए नश्तर लगाये जाने पर पहले जानलेवा दर्द होता है और फिर बाद में आराम आता है , उसी तरह आपकी कवितायेँ ज़ख्म पर नश्तर चुभा कर आराम पहुंचती हैं…. पता नहीं मैं ठीक से कह पाई या नहीं लेकिन आपकी कविताओं ने बहुत आराम पहुँचाया…

    pawansrivastava के द्वारा
    May 23, 2012

    मेरा अभीष्ट सिद्ध हुआ सरिता जी

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 23, 2012

बच्चे भला दीवारों की रस्मे कहाँ मानते हैं आसमां के परिंदे सा हर सदद लांघते हैं बहुत सुन्दर उत्सवों के पहनावे का ताना बाना कैसे समय से पहले तरुणायी प़र हावी होती पतझड़ तुम्हारे ज़िन्दगी को ठूंठ बना कर चली गयी क्या बात है कल्पनाओं का पंख लगा तुम्हारा अज्यमितिय उड़ान ब्योम के विपुलताओं में छलांगा था प़र चूक गए तुम अपने गणना में जब यथार्थ के पटल प़र तुम पटके गए प्रयोसं के चंद फर्लांग मात्र चलने प़र वास्तविकता मेरे रक्त को गटर में बहाती है ? बधाई श्री मान जी. सुन्दर रचना हेतु

    pawansrivastava के द्वारा
    May 23, 2012

    हिरदय से धन्यवाद मान्यवर

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 23, 2012

कल्पनाओं का पंख लगा तुम्हारा अज्यमितिय उड़ान ब्योम के विपुलताओं में छलांगा था प़र चूक गए तुम अपने गणना में जब यथार्थ के पटल प़र तुम पटके गए प्रयोसं के चंद फर्लांग मात्र चलने प़र…. पवन जी , नमस्कार .. क्या दृश्य उपस्थित किया है आपने जनाब … अंतिम में इन उपरोक्त पंक्तियों में गजब लिख गए …. कैसी कैसी जिन्दगिया है सच में और कैसे दरिन्दे जो हमारे बिच में .. घिनौना कृत्य कररहे है महज चंद पैसो के लिए .. मृत्यु देवी भी अट्टहास करती होगी जब भ्रूण कुत्तो के ग्रास बनते होंगे .. बस आहो के सिवाए हम कुछ दे नहीं सकते ये मौत तू अट्टहास कर ले मानवता तो बस मजाक जैसी कोई चीज है .. हमारी विवशता तो बस मूक रुदन की तस्वीर है

    pawansrivastava के द्वारा
    May 23, 2012

    वाह वाह क्या कविता quote किया है आपने ..Infact आह आह कहना चाहिए

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    May 23, 2012

    अभी अभी आपको पढ़ के ही मेरे आह शब्द बन कर निकले है पवन जी …. आभारी हूँ ..

    pawansrivastava के द्वारा
    May 23, 2012

    :) :)

sadhna srivastava के द्वारा
May 23, 2012

तीन कवितायेँ….. तीनो अलग अलग भाव लिए….. हमे शुरुआत बहुत अच्छी लगी….. मज़ा आया…. लास्ट पार्ट sad हो गया…. एक लेखक के सारे गुण मौजूद हैं आप में…. (see who is telling you… jisko writing ka W bhi nahi pata… :) ) जैसा लिखते हैं बिल्कुल वैसा भाव पढने वाले के अन्दर जाग जाता है…. बहुत बढ़िया….

    pawansrivastava के द्वारा
    May 23, 2012

    साधना दुःख सनातन है ,सुख अल्प-जीवी ..इच्छा या अनिच्छा से दुःख को गले लगाना हीं पड़ेगा


topic of the week



latest from jagran