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पागल मन बके दनादन

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लड़ाई झगड़ा माफ़ ,कुत्ते की पोट्टी साफ़

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बेरूख ,बेदिल,सितमज़रीफ़ ….घबराइए मत यह मुगलजातों का लच्छा मैं JJ मंच के किसी व्यक्ति-विशेष के लिए नहीं निकाल रहा …ये बद-बख्त  अल्फाज़ तो मेरे उस बेमुरब्बत सनम के लिए है जो मुझसे दिल-आशनाई कर ,मेरा दिल तोड़ कर चली गयी …

 

 

मेरी लेखनी पर अंतर-निहित वेदनाओं का जब आगमन होगा
कुछ तेरे,कुछ जग के दिए,असीम पीडाओं का जब आकलन होगा
अपने किये कर्मों को क्या छल पाओगी तुम ?
मेरे दर्द के अहसासों से क्या बच जाओगी तुम ?

 

अतीत के चित्रपट पे तब तुम निश्चय देखोगी
हुआ आश्रित था मैं तुझपे ,मेरा चैन तुम लूटोगी
छल जाओगी मुझको तुम ,मेरे हीं एक भूल से
विश्वास वो गहरा पड़ा है आहत,देखो सिंचित धूल से
और फिर तब निष्ठुर जग ये हसने मुझपर आएगा
बची चंद सांसो को भी छीन चला वो जायेगा
लुट चुकी वो वैभव होगी जिसपे मैं इतराता था
मेरे वो सम्मान थे प्यारे जिसमे मैं मर जाता था

 

मेरे अरमान के लाशों से फिर तुम शायद गुजर जाओगी
टूटा मेरा आशियाँ तो क्या,नवीन दुनिया तुम तो बसाओगी
पर जो सोंचो मेरी गली से होकर तेरी डोली का गमन होगा
वहीँ बस थोड़ी दूर पर मेरी चिता का जब शमन होगा
अपने किये कर्मों को क्या छल पाओगी तुम ?
मेरे दर्द के अहसासों से क्या बच जाओगी तुम ?

 

 

चलिए लगे हाथों ऊपर वाले से भी गुहार लगा लेते हैं …क्या पता नाला-ए-फरियाद पे कुछ करवाई हो जाये -

 

हे हरी हर लो मेरी पीड़ा
बंशी की तुम तान से
फिर कोई ऐसी राग सुनाओ
झूमे जग मधुर गान से

 

विनय की वो तेरी रागिनी
अब न मुझसे गायी जाती
हरी मैं निज से हारा जाता
विरह वेदना गहराई जाती

 

द्वेष-राज का राजा देखो
कंस मुझे है मारने आया
प्रेम महान वो भूले भव में
असंख्य अनीकिनी संग है लाया
छीन ली उसने मेरी राधा
अनय-अनख एक बाण से
हे गिरधर मैं गिरा जाता
चोटिल उस अपमान से

 

प्रतिनिधि था प्रेम के तेरे
भावहीन इस भव में मैं
लुटी मेरी निज की निधि,
अब आस पड़ा हूँ तेरे मैं
आओ अब अवसान कंस का
द्वेष-दुष्ट को मारो
करो किशन तुम कृतज्ञ मुझे
अब मेरी दशा सूधारो

 

हे हरी हर लो मेरी पीड़ा
बंशी की तुम तान से
फिर कोई ऐसी राग सुनाओ
झूमे जग मधुर गान से

 

अंत में JJ मंच के अपने सभी दोस्तों(खास कर राजकमल जी ,आनंद जी ,शशि भूषण जी ,संदीप जी और अनिल जी से ) कहना चाहूँगा कि कितना उम्दा लिखते हैं आप, जब आप आपसी द्वेष के दलदल से बाहर निकल कर, अपने लेख में व्यपगत विचारों का मवाद नहीं ,बल्कि जब आप अपने महान विचारों की लड़ियाँ पिरोते हैं …आपसे कहूँ या न कहूँ पर आह …पढ़ कर वाह वाह निकलती है जुबान से ….  आपसे  अपने एक शेर के ज़रिये यह कहना चाहूँगा कि -

 

ए दोस्त यूं जाया न कर अपने इल्म के सौगात को
जो है हुनर तो हंसा दे किसी दिल -ए- नाशाद को

 

 

और हाँ उन दोस्तों से भी गुजारिश करना चाहूँगा जो किसी का समर्थन देकर या फिर किसी के निष्कासन  की बात कर , बहिष्कार की बात कर ,उपेक्षा की बात कर  जाने अनजाने में वैमन्यस्ता को बढ़ावा दे रहे हैं …आत्मस्वीकारुक्ति मेरी -मैं भी ऐसा कर जाता हूँ ..जबकि हमे करना तो यह चाहिए कि जिनके दिल में खलीश है , पीडन हैं ,उनके दिल में हम अपने प्यार का मरहम लगायें ..सबको अपनाएं …सबको प्यार से समझाएं ….हैं न ऐसे कुछ शख्स  -चन्दन जी ,दिनेश जी …किसी का पक्ष नहीं लेते ,किसी से वैर नहीं इनका …हमेशा मेलो मिल्लत की बात करते हैं …क्या हम ऐसा नहीं कर सकते ….हमारे कलम में इतना बुता है ,हमारे विचारों में इतनी द्रुत-गामिता है कि हम चाहें तो  महानता के शिखर पे पहुँच सकते हैं ..जरुरत है तो बस एक संकल्प की-

 

आ मेरे नासिर आ ज़रा
बंज़र में घांस उगा दें
अपने कलम की हरारत से
चल पत्थर को पिघला दें
एक मातम सा पसरा है
हर दिल के दयार में
आ इस उजड़े फ़िज़ां को फिर
बसंती वितान ओढा दें

आमीन .

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadhna srivastava के द्वारा
May 23, 2012

इतनी अच्छी कवितायेँ कैसे लिखते हैं आप….. बहुत सुन्दर….. अति उत्तम….. और शीर्षक तो एकदोम भालो…. :)

    pawansrivastava के द्वारा
    May 23, 2012

    Beauty lies in the eyes of Beholder & The beholder here is such a sweet person that it is bound to happen

sinsera के द्वारा
May 23, 2012

पवन जी नमस्कार, आपकी हंसती मुस्कुराती फोटो बहुत दिनों केबाद दिखी, बहुत अच्छा लगा… शीर्षक पढ़ के अपने बचपन के खेल याद आ गए, छुट्टियों में हम सब भाई बहन न जाने क्या क्या खेल, कूद , लड़ाई झगडा, मान मनौवल ढिशुम फिशुम किया करते थे….यही सब “universal phrases” बोला करते थे…वक़्त कम पड़ता था.. और अब बच्चे छुट्टियों में कहते हैं कि बोर हो रहे हैं…strange………… रचना की तारीफ करने वाले शब्द अब ख़त्म हो चुके हैं…पुराने वाले से ही काम चलाइए…….

    pawansrivastava के द्वारा
    May 23, 2012

    शुक्रिया सरिता जी ….वैसे मेरे मामले में तो यह phrase अब भी जीवंत हैं …दोस्तों से अब भी लड़ाईयां होती हैं और इसी जुमले के ज़रिये सुलह भी :)

sadhna srivastava के द्वारा
May 23, 2012

Welcome back Dada….. :) :)

    pawansrivastava के द्वारा
    May 23, 2012

    welcome to you Sadhna from a breif bout of holiday ..your effervescent persence was being missed by me .

    sadhna srivastava के द्वारा
    May 23, 2012

    wow!!! feeling so good good….. :) :) :) :)

May 23, 2012

मैंने अपने इस आलेख में, कहीं भी नारी जाति को लेकर टिप्पड़ी नहीं की है यदि फिर भी इस पर स्त्री जाति द्वारा इसके विरुद्ध आवाज उठता है तो उनके भवनों का सम्मान करता हूँ और साथ में नारि जाति का भी. अतः इस आलेख के साथ अपना माफीनामा संलगन कर रहा हूँ और पूरी नारी-जाति से इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ. और यदि कोई सजा हो तो वो भी मंजूर परन्तु दूसरों की तरह पोस्ट को हटाकर अपने गुनाहों पर परदा नहीं डाल सकता और ना ही पोस्ट डिलेट करने के बाद , यह कह सकता हूँ कि मुझे किसी बात का पछतावा नहीं है परन्तु दूसरों के कहने पर यह डिलेट कर रहा हूँ. क्योंकि ऐसी महानता मैं नहीं दिखा सकता जिससे गुनाह भी करूँ और खुद को सही साबित करके लोगो की तालिया बिटोरू. साथ ही यह विश्वास दिलाता हूँ कि फिर कभी नारी जाति पर मेरी कोई ऐसी टिप्पड़ी नहीं होगी. हरेक गुनाह के साथ गुनाहगार का माफ़ीनामा होना चाहिए या फिर उसके गुनाहों की एक सजा जो इस बात का उसे याद कराये की उसने गुनाह किया है और साथ ही लोगो को भी पता चले कि वह गुनाह क्या है? अतः मैं अपने गुनाहों पर पर्दा डालकर, इस आलेख को डिलेट नहीं कर सकता. यदि आप सभी के मान-सम्मान और मर्यादा को मुझसे ठेस पहुँच रहा है तो मैं पहिले बोल चूका हूँ कि इस मंच को छोड़कर जाने के लिए तैयार हूँ क्योंकि यदि किसी का मान-सम्मान और मर्यादा खुले आसमान में लटका है तो हवा ( अनिल ) के प्रवाह से उसका हिलना स्वाभाविक सी बात है और वह हमेशा हिलाता ही रहेगा मैं रहूँ या ना रहूँ क्योंकि और भी करक है इस दुनिया में उसे हिलाने के लिए. नोट- कृपया जिस मान-सम्मान और मर्यादा की बात निचे की पंक्तियों में रखा हूँ नारी जाति अपने ऊपर न ले. वह इस मंच के मान-सम्मान और मर्यादा के ऊपर सवाल उठाया हूँ………!

sinsera के द्वारा
May 23, 2012

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

    May 23, 2012

    और नहीं अब और नहीं गम के प्याले और नहीं……उ उ उ…….! घरे जा के मई से कहतनी न की एगो काली मैया हमारे के जहाँ देख उंहा थापरिया दे तरी….चल घरे त बतावनी…! तुहारो माई से शिकायत करम और अपनो माई से….!

    follyofawiseman के द्वारा
    May 23, 2012

    अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी,  ‘अपनी डफली अपना राग’ ………..मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ   रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है………. अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा……अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा…….आत्मवान व्यक्ति respond करता है…..तीन दिन बाद react नहीं……..और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो….मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको……चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का….. इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है…..आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है….. इस सब के आलवे……न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है……..स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है……हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है…….और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो…… “इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…” जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है……ये किसी और लोक की बात नहीं है……….. आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें….की बिना रावण के राम का होना असंभव है…….आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं……ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए…….जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा………. ” इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ” क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा…..अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल……….और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है………..तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है………..क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा……..मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है………ये भिखमंगापन त्यागिए………!  और अंत मे यही कहूँगा….कि , ’जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा….. और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है…………मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा………” (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो…….मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है………) एक और बात ज़रा मुझे बताइए….जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी……? व्यक्ति का अस्तित्व होता है…समाज का नहीं…..मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे……????

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 22, 2012

पवन जी स्वगत है बड़े दिनों बाद .. आपका कुछ पढने को मिला .. धन्यवाद महोदय .. :) अजोबो गरीब शीर्षक डाल कर डराया ना करे जनाब :) :) आपकी हरी से की गयी दुआ काम आ जाये …. आमीन हे हरी हर लो मेरी पीड़ा बंशी की तुम तान से फिर कोई ऐसी राग सुनाओ झूमे जग मधुर गान से…… बेहद मधुर …गीत आ मेरे नासिर आ ज़रा बंज़र में घांस उगा दें अपने कलम की हरारत से चल पत्थर को पिघला दें एक मातम सा पसरा है हर दिल के दयार में आ इस उजड़े फ़िज़ां को फिर बसंती वितान ओढा दें……. आपके लेखनी के जादू पे किसी को शक नहीं … बस सुधिजन आपकी पुकार सुन ले .. शुभकामनाये …

    pawansrivastava के द्वारा
    May 22, 2012

    आप चाहे डरें या हसें ,शीर्षक तो ऐसा हीं अजीबोगरीब सा रहेगा महिमा जी :) :)

Santosh Kumar के द्वारा
May 21, 2012

पवन जी ,.सादर नमस्ते बहुत बहुत साधुवाद ,..इसके अलावा फिलहाल शब्द नहीं हैं ,..पुनः साधुवाद

    pawansrivastava के द्वारा
    May 21, 2012

    धन्यवाद संतोष जी

follyofawiseman के द्वारा
May 21, 2012

“कोई हालत नहीं ये हालत है ये तो आशोब्नाक सूरत है अंजूमन में ये मेरी खामोशी बर्दबारी नहीं है वहशत है तुझसे ये गाह गाह का शिकवा जब तलक है बस-गनीमत है हमने देखा तो हमने ये देखा जो नहीं है वो खूबसूरत है गर्म-जोशी और इस कदर क्या बात क्या तुम्हे मुझसे कुछ शिकायत है……..” ….. जो हुई ही नहीं उसको बंद कैसे करें…………जो द्वेष है ही नहीं उसके दलदल से बाहर कैसे निकले…….लड़ाई हुई ही नहीं और आप बंद करने की बात कह रहें है…….अगर लड़ाई हुई होती तो अपने आप ही बंद भी हो जाती……ये लड़ाई की ख़ासियत है…… इस देश में लड़ाई बस एक बार हुई थी….वो हुई थी ‘महाभारत’…..महाभार के बाद जितनी भी विचार धारा बनी भारत में वो सब की सब लड़ाई विरोधी थी…..और जिसका परिणाम यह हुआ की भारत की आत्मा मर गई….यह देश नपुंसकों का देश हो गया…..और इसी कारण से पिछले 2700 वर्षों से गुलाम है…….कृष्ण के बाद ऐसा कोई भी व्यक्ति पैदा नहीं हुआ जो लड़ाई का समर्थन करता हो……महवीर से लेकर महत्मा गांधी तक सब ने लोगों को कायरता ही सिखाया है……..हमे फिर से लड़ना सीखना होगा…..लड़ाई सृजन की प्रक्रिया की पहली शर्त है……. इसका ये मतलब नहीं है की मैं शांति का विरोधी हूँ…..नहीं मैं शांति का विरोधी नहीं…….मैं भी चाहता हूँ कि शांति हो पर मैं थोथी शांति के विरोध मे हूँ……ऐसी भी क्या शांति जिसे भंग की जा सकती हो…..ऐसी शांति कोई शांति हुई जिसमे सब संयम साध कर ज्वालामुखी पर बैठे हों…….नहीं इस शांति का कोई मोल नहीं है…….. इस प्रकार की शांति मरघट की शांति है…….ये दौ-कौड़ी की शांति है……इसीलिए हे कृष्ण मैं आपकी शांति-प्रस्ताव स्वीकार नहीं करता हूँ……आप आग मे पानी नहीं घी डालिए और एक बार हो जाने दीजिए शब्दों की घमासान लड़ाई……..निकल जाने दीजिए अंदर के शैतान को………सब को नंगा नाच लेने दीजिए…….सब का मन हल्का हो जाएगा……उस हल्के और नीरवता लिए मन से स्वतः सुगंध और प्रेम की झड़ना फूटेगी इसके लिए हमे प्रयास करने की कोई जरूरत नहीं है……लेकिन पहले नफरत को पूरा पूरा निकाल जाने दीजिए……..मत लोगों को दमन सिखाइए……..

    dineshaastik के द्वारा
    May 21, 2012

    संदीप जी बहुत सहज  ढ़ंग से आपने महाभारत  को समर्थन कर  दिया क्या आपको महाभारत  के दुष्परिणाम का पता है, भारत के सारे विद्वान मृत्यु को प्राप्त हुये।  कुटिल मूर्ख  विद्वान  बन गये, इन्होंने अपनी अकर्मता के वशीभूत  होकर ऋषियों के नाम  से पुराणों आदि का सृजन  किया, धर्म  को  अधर्म  का रूप दे दिया। अपने कुनबे को देवता घोषित  कर  दिया। कर्माधारित वर्णाव्यवस्था को जन्माधारित  जाति् प्रथा का रूप दे दिया। कालान्तर में अपने  पुरखों की मूर्तियाँ बनाकर ईश्वर का अपमान करते हुये उनकी पूजा आरंभ  कर दी। इस  तरह  हिन्दु धर्म  का पतन हो गया। जिसका दुष्परिणाम  हमारी गुलामी रहा। मैं कायरता का समर्थन नहीं करता। किन्तु अनावश्यक  हिंसा का भी समर्थन नहीं कर सकता। हिंसा के लिये हिंसा न हो, अपितु शांति के लिये हिंसा हो। महाभारत की हिंसा एक  जमीन के टुकड़े के लिये हुई थी। वह  विचारों की ल़ड़ाई नहीं थी। दो  परिवारों के बीच  की लड़ाई को लोग  धर्म  की लड़ाई की संज्ञा दे देते हैं यह मेरे समझ   के परे है। महाभारत  की लडाई मेरे समझ  के परे है। मैं भी कृष्ण  को महान मानता हूँ किन्तु उनके कुछ  कृत्य मानवीय  दृष्टि से क्षम्य  नही ं हैं। हो सकता है कि मेरे विचारों से कोई सहमत न हो किन्तु मैं तार्किक  कारणों से अपने  विचारों पर अटल  हूँ।

    pawansrivastava के द्वारा
    May 21, 2012

    संदीप जी हम अमन नहीं सीखा सकें ,दमन क्या सीखाएँगे ….और फिर हम खुद तो सीख लें पहले …बहुत कुछ सीखना है

    May 21, 2012

    इसका ये मतलब नहीं है की मैं शांति का विरोधी हूँ…..नहीं मैं शांति का विरोधी नहीं…….मैं भी चाहता हूँ कि शांति हो पर मैं थोथी शांति के विरोध मे हूँ……ऐसी भी क्या शांति जिसे भंग की जा सकती हो…..ऐसी शांति कोई शांति हुई जिसमे सब संयम साध कर ज्वालामुखी पर बैठे हों…….नहीं इस शांति का कोई मोल नहीं है……..  दिनेश भैया और पवन जी इस कुरुक्षेत्र रूपी मंच पर ऐसी ही शांति है जो फूंक मारने पर बुझ जाती है….अतः महाभारत अवश्यम्भावी है…..और इस कुरुक्षेत्र में कौरवों के साथ-साथ पांडवों का वध करना भी अति आवश्यक हो गया है…………!

    pawansrivastava के द्वारा
    May 21, 2012

    अनिल जी जो भूल गए प्यार का वो अंतिम तराना तो रह जायेगा साज़ वो आग लगाने वाला

    May 22, 2012

    जरुरी भी है, पवन जी ताकि आने वाली हमारी पीढियां उस साज को याद करें और इस बात को भी याद करें कि क्यां शान से उनके पूर्वज इस साज को बजाय करते थे…….! हाँ…हाँ…हाँ….प्यार हुआ तकरार हुआ…तकरार से फिर क्यों डरता है दिल कहता है दिल…हम कुत्ते बड़े मुश्किल…न जाने किस-किस को काट खायेंगे…हाँ…हाँ…हाँ…!

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    May 22, 2012

    दिनेश सर .. आपसे सहमत हूँ .. पर पांड्वो और कृष्ण के पास कोई और दूसरा रास्ता भी नहीं था .. सत्य आचरण को ही धर्म कहा गया है .. और असत्य आचरण को अधर्म … इस लिए महाभारत को धर्म की लड़ाई कही गयी ..

    pawansrivastava के द्वारा
    May 22, 2012

    जानता हूँ अधिकार खोके बैठे रहना यह महादुष्कर्म है न्याय के लिए बंधू को भी दंड देना धर्म है पर इसी तर्ज पर कौरवों का पांडवों से रण हुआ जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ फिर दंड का स्वरुप हमेशा हिंसक हीं क्यूँ हो ?

    May 22, 2012

    माफ़ करियेगा…आज के अर्जुन और कर्ण हिंसक नहीं है और न ही इसके समर्थक पर शैली तो ऐसी अपनानी पड़ेगी ही ताकि सामने वाला का हिंसक स्वरुप बाहर आ सके जिसे वो एक परदे में छुपाना चाहता है…..! और हम यहाँ जितने के लिए नहीं है……पर हारने के लिए भी नहीं हैं……! जो जीता नहीं उसे हारने का सवाल ही नहीं उठता और जो हरा नहीं उसे जितने का भी सवाल नहीं उठता…..बस यही पाठ पढाना है कौरवों और पांडवों को पर यह बात जीतनी मामूली लगती है उतनी ही जटिल है….जो की किसी व्यक्ति को तबतक समझ में नहीं आने वाली जबतक वो मान-मर्यादा और शराफत के चोला ओढ़े …..झूठे अभिमान के वशीभूत है….!

चन्दन राय के द्वारा
May 21, 2012

पवन मित्र , आपने जो बिरवा रोपे है मुहब्बत के इस बंजर जमीन में मुझे यकीं हो चला मेरे दोस्त बहार आने का , मित्रों तो आओ दिखा दे इस अंजुमन को , यंहा हर खुशबू गले मिलती है

    pawansrivastava के द्वारा
    May 21, 2012

    सौआमिन


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