Laptop wala Soofi

पागल मन बके दनादन

25 Posts

496 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 10106 postid : 68

राम जाने लोग तुक बंदी करते हैं कि थूक बंदी

  • SocialTwist Tell-a-Friend

वो ज़माना था अहले-ज़फाओं का …तब मुहब्बतदारी जुर्म नहीं दर जुर्म हुआ करती थी और मुहब्बत की हिमाकत करने वालों को पत्थरों से मारा जाता था …उसी ज़माने में मजनू ने भी खाए थे पत्थर पर खुदा कसम आलोचनाओं के जितने पत्थर  Folly Ji ने खाए हैं ,क्या मजनू ने खाए होंगे…..अगर उनके तादात को आधार बनाया जाए तो फिर तो Folly जी सरासर गलत हैं….. पर ऐसा है नहीं…. क्यूंकि कभी कभी majority means all the fools are at one side .

क्यूंकि आज के ज़माने में समंदर के तल से सुई ढूँढा जा सकता है पर विवेकशील आदमी को ढूँढना नामुमकिन है …..ठहरिये बात पूरी नहीं हुई है ….छिछले ज्ञान का छदम आवरण ओढ़े ज्ञानी तो कई मिल जायेंगे पर वो ज्ञानी विरले मिलेंगे जिनके ज्ञान में सच का आत्म-स्वीकृति हो ,जिनके ज्ञान उस हीरे जैसा हो जो सच के खराद पे चढ़ के चमकता है ..जो सच को कहने के लिए थोथे दलील का सहारा नहीं लेता … जो निज मन को टटोलता है फिर कहता है ,वही जो उसने अवचेतना के सूक्ष्म स्तर पे महसूस किया है ….मन एक अथाह समंदर है और ज्ञान का हीरा मन के अवतल पे रक्खा है….छिछले गोते से कम नहीं चलेगा …गहरे में जाना होगा ….अवचेतना के गहरे स्तर को ज्ञापित करना हीं तो ज्ञान है ..

 

काग भुशुण्डी की तरह कांव कांव करने वाले ज्ञानी ,उनको मैं बहरूपिया कहूँ तो ज्यादा उपयुक्त होगा…. वे अपने अंतसमन पे पड़े नंगे सच को वो बराबर देख रहे हैं पर चूँकि डरपोक हैं कहेंगे नहीं किसी से ….कहेंगे क्या- अपनी नंगई ?

 

एक नंगे सच से आपको अवगत कराऊं…. सुनेंगे ज़रा ठहर के ,खुले दिमाग से ,पूर्वाग्रह का बगैर कोई चश्मा पहने …..एक बार बस खुद को सच के पारावार में गोता खाने के लिए छोड़ दीजिये और सुनिए मेरी बात ध्यान से …

 

ज्यादातर मामलों में इंसान अगर किसी को इज्ज़त देता है या प्यार करता है न तो यह Conditioning  की देन है conditioning के चमत्कार को समझाने के लिए एक रोचक तथ्य का सहारा लेना चाहूँगा . . ऊंट को उसका महावत शुरू शुरू में मोटे मोटे जंजीरों  से बांधता है फिर केवल बाँधने का स्वांग करता है …ऊंट को लगता है कि वह सचमुच मोटे जंजीरों से बंधा है …हस्बे आदत वह बैठा रहता है अपने खूंटे के पास .

 

मेरे पिता ने अपने पिता ,पितामह से सुना और  मैंने अपने पितामह से सुना की माँ महान होती है ,पिता पूजनीय होते हैं ……हजारों साल से यह घुट्टी हमे पिलाई जाती रही है और इसलिए हम माँ बाप की इज्ज़त करते हैं ठीक यही conditioning  लागु होता है माँ बाप द्वारा बच्चों को प्यार किये जाने में भी … जी हाँ conditioning ..अगर यह स्थायी भाव होता तो मन में उह-पोह कि स्थिति नहीं बन रही होती …सोंच का तराजू कभी अच्छाई तो कभी बुराई के तरफ नहीं झुक रहा होता …मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि चाहे नैनो सेकंड के लिए हीं सही एक बेटा सोंचता है गिरी से गिरी बातें  -पिता के मरणोपरांत कितना पेंशन मिलेगा ,अनुकम्पा की नौकरी मिलेगी या नहीं ..उनके मृत्यु उपरान्त होने वाले बीमा के रकम का आकलन करता है …क्या है यह सब ?…..अपने देहाती माँ बाप को कहीं शानो शौकत वाली महफील में ले जाने से पहले दो बार सोंचता है कि कहीं माँ का जाहिलपन मुझे मजाक का पात्र तो नहीं बना देगा ….भले अंतर्द्वंद के बाद उसका मन अपने विकार पे काबू प् ले पर यह सभी घटनाएँ होती ज़रूर है …क्या है यह सब ? …और जब यह सब बातें अन्तह  हिरदय में अवघटित हो रही होती हैं तो एक और Conditioing द्वारा आरोपित एक विचार आता है ‘छि यह तू क्या सोंच रहा है अपनी माँ ,अपने पिता के बारे में’ और आदमी झट से अपने विकृत सोंच का कपट बंद कर देता है ….और तो और इस कदर शरीफ हो जाता है कि खुद को भी यह भान नहीं होने देता कि उसके ज़ेहन में नैनो सेकंड के लिए हीं सही ऐसी सोंच आई थी …….क्या है यह सब ? …आपने देखा होगा एक माँ अपने कमाऊ पूत को अपने निकम्मे बेटे से ज्यादा प्यार करती है …क्या है यह सब ?

 

माँ के साथ दुर्व्यवहार करके देखिये …देखिये उनका प्यार आपके लिए कैसे छू मंतर हो जाता है ….या आपके माता -पीता आपके साथ दुर्व्यवहार कर लें ..बस आपके संयम के ,सहन -शक्ति के ज़रा पार तक फिर देखिये वो माँ बाप जिसपे आप बड़े बड़े आलेख लिख रहे हैं ,कैसे विलेन बन जाते हैं आपके लिए .. आप यह सुन कर खूब बवेला मचाएंगे पर आप इस सच को  नकार नहीं सकते …इन्सान दो हीं तरीके से जी सकता है बुद्ध बन कर या बुद्धू बन कर …बुद्धू हैं तो ज्ञान की पिपासा कभी जेगेगी  नहीं …और अगर बुद्ध बन गए तो सब समझ जायेंगे ….(आपको विदित होगा की विपासना  के बाद एक दिन जब बुद्ध अपने घर भिक्षा मांगने आये थे तो उन्होंने अपने माँ और पिता को अपना माँ -पिता मानने से इनकार कर दिया था ).. बीच वाले लोग बड़े खतरनाक होते हैं ..वे शब्दों के कयिकाओं से मेल-मिलाप कर लौट आते हैं ,उनके रूह में उतरते नहीं …और चूँकि वे रूह में नहीं उतरते हैं,वे लेख का अभीष्ट नहीं समझ पाते ….

 

यह सारी बात कहने के बाद अब कहता हूँ वो बात जो शायद हम सबको वज़ह देती है एक दुसरे से जुड़ने का …इसे समाज शास्त्र के भाषा में परस्पर निर्भरता का सिर्धांत कहते हैं ..यह जहाँ कहीं भी है-.माँ -बच्चे के बीच ,किसान और बैल के बीच वहां प्यार है ..जहाँ नहीं है वहां प्यार न्यूनतम  रूप में दीखता है ..उदहारण के लिए Middle East ke ERID ZONE जहाँ के उसर ज़मीन में खेती नहीं होती और इसलिए परस्पर निर्भरता कम है और इसलिए प्यार भी कम है …वहां के लोग आक्रामक  हैं …असमाजिक हैं …..नदियों के किनारे उपजाऊ ज़मीन पे सभ्यताएं ,मेलो-मिल्लत की संस्कृति इसलिए विकसित हुई क्यूंकि खेती के बहाने ,हल बनाने वाला ,कुदाल फावड़े बनाने वाला ,अन्न उपजाने वाला ,अन्न बेचने वाला  सभी के बीच परस्पर निर्भरता बढ़ी और बढ़ा भावनात्मक सम्बन्ध ….

 

पर सच्चा प्यार इससे भी श्रेष्ठतर चीज है …. वहां आपके प्रिय के प्रति आपका वस्तुगत भाव  नहीं,अध्यात्मिक भाव रहता है …वहां आप उसपर अपना स्वामित्व नहीं चाहते ….आप बस उसे चाहते हैं ..बगैर वाणिक वृति  रक्खे ,बगैर उसके गुण-अवगुण का आकलन किये ..बगैर उसे महान कहे . ..ज्यादातर लोग प्यार को एक वसुगत निकाय मान लेते हैं … तभी तो लड़की से प्यार किया और एक खूबसूरत सामान के तरह शादी कर घर ले आये और रख दिया कोने में ….सामान जर्ज़र हुआ ,रूप लावण्य कम हुआ और प्यार काफूर …माँ-बाप  के मामले में  माँ बाप जब तक ज़रूरतों को पूरा करने वाले बने रहें (फिर चाहे वो ज़रुरत मौद्रिक हो ,आया बन बच्चों के देख रेख करने की हो या अन्य कोई ज़िम्मेदारी )महान बने रहे ….{एक बात स्पष्ट कर दूं की इस मंच पे बहुत से सज्जन ऐसे होंगे जो अपनी माँ से गहरा प्यार करते होंगे पर मैं Theory of average की बात कर रहा हूँ कतिपय उदाहरानो की नहीं .}

 

यह कहना कि माँ महान है तो ज़रा बताइए उन कुवारी लड़कियों का क्या जो ज़ज्बात के रौ में बह कर गर्भाधान कर लेती हैं और फिर समाज के निंदा के भय से अपने पेट में पल रहे बच्चे को मरवा डालती हैं ….चलिए आंकड़े के परिप्रेक्ष्य में बात करते हैं …प्रतिदिन संसार में १ लाख १५ हज़ार लड़कियां  या यूं कहें माएं अपने पेट में पल रहे बच्चों को मरवा डालती हैं …उनमे ७० % वो औरतें हैं जो लोक लज्जा के भय से ऐसा करती हैं …तो बताइए क्यूँ नहीं उनकी ममता लोक निंदा के उनके भय पे हावी पड़ती हैं …जब उन्ही  औरतों को ऐसा लगता है मातृत्व सामाजिक मान्यतों और मर्यादाओं के दायरे में हैं तो वे अपने मातृत्व का डंका पीटने लगती हैं …..या शायद गलत कह रहा हूँ मैं हम आप मातृत्व को अलौकिक ,अनुपम ,महानतम घटना मान लेते हैं ….इसलिए कि हम उन बच्चों में से नहीं जिन्हें कोख में हीं कब्र नसीब हो गया …..गौर कीजियेगा शादी से पहले का मातृत्व पाप ….शादी के बाद का मातृत्व महानता …यह बात मेरे समझ के तो परे  हैं .

 

मेरे विद्वान दोस्तों सबसे पहले तो एक ग़लतफ़हमी दूर कर लें कि महानता एक generic phenomena (आम घटना) है …जी नहीं अगर ऐसा होता तो भारत में हर महिने 20 लाख औरतें माँ बनती हैं …कायदे से जिस देश में हर महीने २० लाख लोग महान बन रहे हैं,उस देश का तो अब तक  काया कल्प हो जाना चाहिए था . …माने मेरी बात महानता एक विरले होने वाली एक खास और व्यक्तिपरक घटना है ….यह एक व्यक्तिगत गुण है …हर किसी पे महानता का विशेषण नवाज़ देना  बेवकूफी है ….देखा जाये तो लगभग हर शादीशुदा औरतें माँ हैं …आपके बगल में रहने वाली वो पड़ोसन भी जो कुंजर्नियों की तरह लडती रहती हैं …वो औरत भी माँ है जिससे दुखी होकर पति आत्महत्या करता है …सास ताने उलाहने देती हैं …क्या वे सब महान हैं ….आप जिस औरत को, अपनी माँ को महान कह रहे हैं वह आपके उत्कट प्रेम जनित भावों का परिणाम है पर उसी समाज में कई ऐसे लोग हैं जो उस औरत को १० खूबियों ,१० खामियों वाला साधारण इन्सान समझते हैं …माँ और पिता को महान कहने के पीछे सामाजिक अभियांजना यह है की हम अपने जन्मदाता के प्रति अनुग्रह का भाव रखें …..तो रखिये न ,पर आँखें खोल कर …..उनके गुण ,अवगुणों को समझते हुए क्यूंकि अगर आप उन्हें महान समझने का पूर्वाग्रह रखे रहंगे तो उनके मानव-सुलभ विकारों का उपचार नहीं कर पाएंगे …..फिर आपकी पत्नी आपकी महान माँ से प्रतारित होती रहेंगी और आप माँ के स्तुति गान में खोये इस वास्तु-स्थिति से अनभिग्य रहेंगे ….एक व्यग्तिगत udaharan के ज़रिये  अपनी बात स्पष्ट  करना  चाहूँगा …मेरे पिता मुझे बहुत अजीज हैं ….मेरा ज़र्रा ज़र्रा उनका ऋणी है …पर मैं उन्हें अकेले किसी दुकान में जाकर खरीद फरोख्त नहीं करने देता क्यूंकि मुझे उनका एक अवगुण पता है ..मुझे पता है की वे थोड़े गुस्से वाले हैं ..दुकानदार ने ज्यादा कीमत कहीं बता दी तो वे लगेंगे खरी खोटी सुनाने …’दुकानदारी क्यूँ करते हैं आप लोग ..डकैती कीजिये ‘कुछ इस तरह की तल्ख़ बातें ….कोई दुकानदार उन्ही की तरह गुस्से वाला हुआ तो वह बेअदबी पे उतर आएगा …..अपने पिता की मैं इज्ज़त करता  हूँ पर उनको महान मान कर मैं आँखें मूंद लूं तो मेरे पिता हीं सबसे पहले खुद को मुसीबत में डाल लेंगे … और मैं मानता हूँ की आप सबों को भी अपने अजीजों का गुण अवगुण पता है ..आप उनकी प्रकृति के हिसाब से रन निति तय करते हैं ….कहाँ उन्हें ले जाना है ….कौन सी बातें बतानी है …खूब सोंचते हैं आप …

और इसमें कुछ गलत भी नहीं …फिर तो आप भी जानते हैं की आपके माता पिता खूबियों और खामियों वाले साधारण इन्सान हीं हैं …फिर यह महानता का भरी भरकम शब्द उनपे क्यूँ  लादना..बगैर ऐसा किये भी तो हम बड़ी शिद्दत  से अपने पुत्र धर्म का निर्वहन कर सकते हैं .

 

जिधर देखों माँ माँ की रट लगी है ….घमसान वाकयुद्ध छिड़ा है औरतों के माँ बनने के मुद्दों पर ….मां नालायक है या नहीं यह तो पता नहीं पर हाँ  इस मुद्दे के चक्कर में कई माँ के लाल नालायक ज़रूर बन गए …. थोड़ी नालायकी मैंने भी कर दी जब देखा लोगों को एक अकेले आदमी पे व्यंग्य का विष बुझा बाण चलाते हुए ….. यहाँ अपने उस बेहूदगी को उद्धृत कर रहा हूँ (लाल रंग में क्यूंकि वो शब्द रुपी ज़ज्बातों का रक्त-श्राव है ):

 

एक तरफ भुजंग विषधर ..एक तरफ मानव दर्प धर …बताइए कौन जीतेगा ….मैं बताऊँ मानव …क्यूंकि मानव तो ज्ञानी होता है …दूसरों को मुर्ख समझने वाला …..अरे महत्मनो..समय की कताई से सोना बुनने वालों …..एक बार और समय जाया कर लो और संदीप जी के लेख को /सरिता जी की टिपण्णी को फिर एक बार पढ़ लो ….क्यूँ उनके मूंह में वो बातें ठूस रहे हो जो उन्होंने कही नहीं …..ज्ञान की उत्कृष्ट चोटी पर झंडा फहराने वालों ,उतनी ऊँचाई से देखोगे तो लोग कीड़े मकौड़े(मुर्ख) हीं दिखेंगे …..थोडा विनम्रता के धरातल पे भी उतरो और उनके लिखी बातों का सही मतलब समझने की कोशिश करो …उन्होंने एक औरत के गले से मातृत्व का अलंकरण उतारा है तो उस औरत को सर्व-भौमिक वात्सल्य का चन्द्रहार पहनाने के लिए …..उस औरत को एक व्यक्तिक जननी माँ से जगत जननी माँ बनाने के लिए ….पर जिन आखों में अहम् का मोतिया बिन्द हो उन्हें यह सब कहाँ दीखेगा …..उलटे मेरी बातों से काफी मिर्ची लगेगी ….तो आत्म-शलाघा में डूबे रहने वालों लोगों मैं हूँ थोडा कूड़ दिमाग …तुम्हे मिथ्या स्तुति की शिरी पिलाने से तो रहा ……तुम्हारे पूँछ पे पांव रख दिया ….आओ फुफकारो ,विष वमन करो ….मुझसे भी कहो कि लोक-प्रियता अर्जित करने के लिए मैं यह सब लिख रहा हूँ …फिर मैं जोर से हसूंगा और कहूँगा -

 

वो शोलगी भरी कैफ़ियत और सीरी ज़ुबान वाली शख्सीयत:

वो लुभावने ज़िल्द में छिपी घटिया दास्तान वाली शख्सीयत:

वो काली सोंच और सफ़ेद गिरेबान वाली शख्सीयत:

वो बेचकर गैरत और ईमान ,हुए महान वाली शख्सीयत:

अगर ऐसे बनती है शख्सीयत तो हम गुमनाम भले

 

थोथे शब्द तो मैं  सह भी लूं  पर थोथे विचारों को कैसे सहूँ ?….और इससे भी ज्यादा जो बात मुझे नागवार गुजर रही थी वह थी लोगों का व्यकतिगत टिका करना ….भाई दो लोगों के विचार अलग हो सकते हैं …दोनों अपना अपना पक्ष रख सकते हैं …पर एक दुसरे को  असुर.मुर्ख ,संस्कार विहीन कहने लग जाना यह तो लेखकों को बिलकुल शोभा नहीं देता ….आप तल्ख़ से तल्ख़ बातें कहिये ,होने दीजिये विचारों का द्वन्द पर व्यग्तिगत टिका टिपण्णी करना कहाँ की समझदारी है. आप अपने एक वक्तव्य में माँ के महान होने का दंभ भर रहे हैं वहीँ किसी को संस्कार विहीन कह  उसकी माँ को गाली दे रहे होते हैं …..आखिर जींस का हीं तो दूसरा नाम संस्कार है …..यह कैसा न्याय हुआ आपका …

 

माँ पे कविता मैंने ही लिखी थी और बहस वहीँ से शुरू हुई थी … उस कविता का शीर्षक था ‘-इसे पढोगे तो अपने माँ से और भी ज्यादा प्यार करने लगोगे’ ….लोगों ने इसे पढ़ा और बजाय माँ से ज्यादा प्यार करने के ,आपस में ज्यादा  तकरार करने लगे ….अब इस बहस को लगाम लगाने की एक आखिरी इमानदार कोशिश कर रहा हूँ ….जो समझ गया वो ज्ञानी …जो नहीं समझा वो महाज्ञानी …उसे तो ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते ….इसमें कोई शक नहीं कि वे औरतें परम पूज्या हैं जो  बड़े हर्षो-उल्लास के साथ मातृत्व का वरन करती है ,यह जानते हुए भी कि माँ बनना,जन्म देना कितना कष्टसाध्य है ….कितना पीड़ा दायक है …एक जीवन ज्योत जलाने कि कोशिश में उनके खुद की समां-ए-हयात बुझ सकती है ….पर आज के सन्दर्भ में माँ बनना न केवल खुद के साथ निष्ठुरता है बल्कि उस शिशु के साथ भी निष्ठुरता है  जो विषाक्त हो चुके पर्यावरण में ,गला काट प्रतियोगिता वाले माहौल में विरल हो रहे साधनों के साथ येन-केन-प्रकारेण से जिंदा रहने के लिए छोड़ दिया जायेगा ….माँ तो चली जाएगी परलोक ,रह जायेगा उनका बच्चा रोटी,हवा पानी ,ज़मीन की खीचमतान करते लोगों की अपार भीड़ में अकेला लड़ने के लिए या भूखे मरने के लिए …..और पराया बच्चा भी कोसेगा इस माँ को -कहेगा हाय ज़िन्दगी के नहिफ से जुगाड़ को किस किस से बाटुं ???  और तब महान माँ सचमुच नालायक कहलाएंगी ….क्या इससे बेहतर यह स्थिति नहीं कि एक समर्थवान औरत सुडान,सोमालिया या भारत के ही कुछ ऐसे  बच्चों की माँ बने  जो कुछ इस तरह की ज़िन्दगी जीते हैं  :

 

समानान्तर दूर बहुत दूर तक चलता यह शहर

लंबे चौडे रास्तों को संकुचित बनाती भीड,

मध्यस्थता करती है या पाटती है समांतरता को .

एक करीने से सजा खिडकीयों का महल

जिसकी हर खिडकीयां अपनी ऊंचाइ के कारण

भीड के उस पार अपने समानान्तर देख पाती है

या फ़ेंक पाती है विदेशी लेबलों के खाली डब्बों को .

उस पार चिंदरीयों के छत का अतिकर्मण

या ऊंचाइयों का कूडेदान

जिसके फ़टे चिंदरीयों के अन्दर जमा होते हैं

खाली डब्बे ,बेकार कपडे ,झूठन उन ऊंचाइयों के.

सरकारी योज़ना है अगले माह इन झुग्गियों को हटाकर

एक विस्त्रित बाजार बनाने की ,जहां मौज़ूद होंगी

अमीरों के एशो-आराम की नुमायगी की तमाम सामानें .

सरकारी द्वारा निर्धारित कूडेदान नहीं यह

इसलिये झुग्गियों का अतिकर्मण ज़रूर हटेगा .

हां इसकी आशवस्ता है कि उस चिंदरी के बाशिंदों को छोड,

तमाम कूडा सरकारी कूडा-घर में जमा होंगी

 

स्वप्नहीन सूखे शरीर एक टेक बनाते

समानान्तर लंबी उन पटरियों पर

शून्य को निहार रहे होते हैं .

कुछ एक पैरों से सुगबुगाते ,

जीवित होने का आभास दिलाते ,

छोटे-छोटे नंगे-अधनंगे शरीर लिपटे हैं .

उनकी यह बेकदरी

उन सूखे स्तनो के खींचने के कारण है ,

जिनसे वे प्राण की चंद बूंदे न खींच पाये

अपने यौवन उत्कर्ष पर गर्मी इतनी तीव्र कि

अपनी प्रचंडता का अहसास

वातानूकुलित कार के अन्दर तक करा जाती है .

फ़िर वही बध्यता पेपसी के केन को खोलने की ,

होठों पे प्यास जो उमड आयी होती है .

कार की खिडकी से बाहर गिरते

उस डब्बे की टनटनाहट

तानपूरे से भी ज्यादा मधुर या

अदभूत वह जीवन शक्ती जो पत्थर से दबे घांस को

फ़िर से सतह पे ले आती है.

गेंद सा सिकुडा वह बच्चा डब्बे की टनटनाहट पर

दौड जाता है,डब्बे को पलटता है,

रंगों की विविधताओं को निहारता है और चाहता है

उस चटकीले रंगों वाले केन से खेलना ….

फ़िर स्तनो के तरह सूखे उस खाली केन को

साहाबी रूआब के साथ होठों से लगाता है कि

तभी एक तमाचा उस बच्चे के गालों पर…..

निस्तेज़ ,निष्क्रिय ,निष्प्राण आंखों वाला वह आदमी

अपने बच्चे से उस केन को छीन लेता है

कुछ इस तरह मानो बहुत बडी सम्पत्ती हो वह…..

क्या दो सूखे रोटीयों का जुगाड इतना मंहगा भी हो सकता है ?

 

       ****

 

उनके नन्हे आँखों में शून्य के भाव

जैसे कोई सफ़ेद कैनवास में

सफ़ेद रंग भरता जा रहा हो

आकार देने के मद्दे ब्रुश चल रहा है

आंकें,बनाए,बुने तरीकों से

पर सफ़ेद पटल पे सफ़ेद रंग की

कोई तस्वीर नहीं उभरती ….

बस यही निरंतरता

उन नन्हे आखों में जो

शून्य की गहनता में कुछ

स्वप्नमयी आकार देना चाहते हैं …

जारी है प्रयास विराम को पाने का ,

इस मुगालते में कि कहीं

कोई आकार उभरेगा ..

अजीब विडम्बना !

ग्रीष्म ऋतू के गर्म थपेड़ों के बीच

सूखे होंठों वाले बच्चे तरलताएं उड़ेलते हैं ..

स्तब्ध रातों में हड्डियाँ तक को भेदती

शीत ऋतू की सर्द हवाओं के बीच

नन्हे से ठिठुरे हाथ

लोगों को उष्णताएँ परोसते हैं ;

साहब के बूटों को वो

चमकाते हैं नंगे पैर और

चौक दर चौक हथेलियों पर

जमीं किस्मत लेकर

नन्हे हाथ लोगों को ज़रूरतें बेचते हैं

इस आस में कि कहीं

चंद सिक्कों कि रगड़

उनके हाथों कि ढीठ किस्मत को

मिटा दे

दुर्बल सी काया न जाने किस प्रेरणा से

भेद पाती है शोरों को या

दौड़ पाती है भीड़ की

उन्मुख्ताओं के साथ

न जाने कितनी झांकियां

जीवन के विसंगताओं की …

एक हीं पटरी पर दो समानांतर जीवन ..

सरपट भागते कदमो को

आवाज देती आशाएं

दूर सामानांतर तक चलती है उनके साथ

‘जूते पोलिश करा लो साहब ‘…

सूट पे सटीक संगतता को दर्शाती टाइयाँ

जिनको बेच लेने की आतुरता

निर्लिप्त है उन मासूम आँखों में ;

कभी नहीं देखी ललक उनमे

साहबी रुआब को नकलाते

अपने अधनंगे जिस्म में टाई लगाने की

या बलून बेचते बच्चों को

प्रयासों के बाड़े से निकलकर

उन्मुक्ताओं की हवाओं में

एकाध बलून तैराने की ..

नहीं देखा उनको अपने हीं रेहड़ी से

कभी कुछ चना फांकते ,

कभी कुछ बुँदे गटकते ..

केवल और केवल इसी प्रयास में

कि शायद अपने जीवन के

सफ़ेद पटल पे सफ़ेद रंगों से हीं

सही कुछ आकार देख सकेंगे

दुर्बल बदन की सुगबुगाहटों पे

जीवन को ढ़ोती उनकी जीजिविषा ,

इसे चरमं तक ढ़ोने का प्रयास करती है

और करती है प्रयास हमारे सम्मुख

लज्जाओं के चरम स्तर तक

और हम अपने

एयर कंडीशन रूम में बैठे

अपनी महानता के कसीदे गाते हैं ,

अपने मातृत्व ,

अपने वात्सल्य पे दम भरते हैं

 

 

P.S-जानता हूँ भानुमती का पिटारा खोल दिया है मैंने ….तरह तरह की बातें होंगी …..आपके  हर सुतार्किक आलोचना  ,हर मंतव्य का स्वागत है बस कृपा कर व्यक्तिगत छींटाकशी से बचियेगा ….हाड़ मांस का इंसान हूँ ….पीड़ा होगी तो पलटवार करूँगा …कलमकारी ठीक ठाक कर लेता हूँ तो तय है की नहले पे दहला फेंकूंगा

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

44 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santosh Kumar के द्वारा
May 5, 2012

पवन जी ,.सादर अभिवादन आजकल मैं मंच की प्रतिक्रियाओं को नहीं देख पाता हूँ ,..आपके लेख भी नहीं पढ़े हैं किन्तु जो भूचाल आया है उसके केंद्र बिंदु आप और फोली जी हैं ..आपकी यह पोस्ट भी नहीं पढ़ पा रहा हूँ ,..आप अच्छा लिखते हैं ,.लम्बाई थोडा कम रखिये तो हम जैसे मूरखों को आसानी होगी ,.एक साल में मंच पर अपने सिवा और किसी के बारे में कुछ नहीं (शायद बहुत कम ) लिखा है ,..लगता है कि इस बार एक पोस्ट देना पड़ेगा ..नहीं नहीं मैं नहीं लिखूंगा भाई ..अभी समय नहीं है ,..मिलते ही कुछ लिखने का प्रयास करूंगा …

sanjay dixit के द्वारा
May 2, 2012

नमस्कार पवन जी ,बहुत लम्बी पोस्ट हो गई है आपकी लेकिन जितना भी पढ़ा ,आपकी लेखन शैली का कायल हो गया ,धीरे धीरे पुरी पोस्ट पढूंगा ,हो सकता है पूरा पढने के बाद सहमती या असहमति के कुछ बिंदु उभरें ,उम्मीद है एक स्वस्थ प्रतिक्रिया का आप स्वागत करेंगे

    pawansrivastava के द्वारा
    May 3, 2012

    आपका तहे दिल से स्वागत है संजय जी …..अच्छे नियत से की गयी आलोचनाओं का मैं पूरा सम्मान करता हूँ

jyotsnasingh के द्वारा
May 2, 2012

आदरणीय पवन जी, आप एक मूर्ती भंजक का काम कर रहे हैं, सच मैं ही हमारी कोन्दोतिओनिन्ग की जाती है बचपन से.और तभी हमारी सामाजिक संरचना का ताना बना बुना जाता है, सिर्फ प्यार ही क्यों हम कैसे उठे बैठे ,किस अवस्था में कैसे आचरण करें या करना चाहिए ये सिखाया जाता है .पर तभी हम इंसान कहलाते हैं.सिर्फ जंगली जानवर ही नैसर्गिक जीवन जी पाते हैं नहीं तो हम अपने पालतू जानवरों और पौधों को भी कोंडिशन करते हैं .और जहाँ जानवर समूहों में रहते हैं वहां भी उनको बचपन में तहजीब सिखाई जाती है.अगर ऐसा न हो तो अराजकता अवश्यम्भावी है.हाँ माँ बाप भी इंसान ही होते हैं परन्तु अपने वंशजों से प्रेम एक नैसर्गिक भावना है. ज्योत्स्ना.

    pawansrivastava के द्वारा
    May 3, 2012

    ज्योत्स्ना जी ..मेरे ख्याल से मेरे लेख को आप दुबारा पढ़िए …..मैंने आस्था पे नहीं अन्धविश्वास पे चोट की है ….और मेरा सर्व-प्रमुख अभीष्ट तो यह भी नहीं …..क्या है मेरा अभीष्ट ,दुबारा पढ़िए शायद समझ जाएँगी …..और लेख पढने से पहले मेरा फोटो मत देखिएगा …..शक्ल मेरी बड़ी हरीफ़ाना किस्म की है ,लोग गलत समझ लेते हैं …अपने बारे में अपने अंदाज़ में यही कहूँगा (निज स्तुति )- शफकत का समंदर बहता है मेरे अन्दर मेरे दिल के दबीज सतहों को कोई प्यासा तोड़ कर तो देखे

vinitashukla के द्वारा
May 2, 2012

यह भानुमती का पिटारा अवश्य है पर इसमें कई काम की बातें है. ‘तथाकथित’ लेखकों की रोचक ढंग से खिंचाई की गयी है. लेखन शैली अत्यंत प्रभावी है. बधाई एवं साधुवाद.

    pawansrivastava के द्वारा
    May 3, 2012

    बेगानों की भीड़ में कोई अपना तो मिला …बहुत अच्छा लगा विनीता जी ….इसे अपने शब्दों में कुछ इस तरह से व्यक्त करूँगा – सहस्त्र तारों के नीचे किन्तु रजनी स्याह सी है काली पर एक रवि की आभा से दिवस ने है पाया उजियाला

satish3840 के द्वारा
May 2, 2012

पवन जी नमस्कार / में काफी दिनों से आप की पोस्ट पर आ रहा हूँ पर आज में इतनी लम्बी पोस्ट देख घबरा गया / इसमें गद्य , पद्य सभी हें / आपने बहुत मेहनत की हें पर रचना लम्बी होने के कारण पाठक उसे उतना समय नहीं दे पाता/ और आप की काफी मेहनत का पूरा फल नहीं मिल पाता / आप से मेरा व्यकिगत अनुरोध हें कि अब तक विषय की मांग न हो तब तक यदि छोटी पोस्ट ही रखें / आप लम्बी पोस्ट को छोटा छोटा करके अलग अलग शीर्षक से पोस्ट कर वाह वाही लुट सकते हें / जिसे की ये रचना काफी लम्बी हें अतः इसे तीन चार बार पढने पर भी कोई सटीक पर्तिकिर्या लिखना मेरे लिए संभव नहीं हो पा रहा हें / आशा हें आप कटु पर सत्य वचन के लिए माफ़ करेंगें /

    pawansrivastava के द्वारा
    May 3, 2012

    शर्मिंदा मत कीजिये सतीश जी …..एकागिपन के उत्तांग चोटी पर ज़ज्बातों का समंदर लिए खड़ा था ….जाने कब बांध टूट गया और भावनाएं अधोमुखी घाटी की तरफ बह निकली …बहती 212गयी बहती गयी जब तक संतोष का समतल धरातल नहीं मिला गया

follyofawiseman के द्वारा
May 2, 2012

“न: दे नामे को इतना तूल ‘ग़ालिब’ मुख़्तसर लिख दे” “.आपके हर सुतार्किक आलोचना ,हर मंतव्य का स्वागत है बस कृपा कर व्यक्तिगत छींटाकशी से बचियेगा”….. ‘काट कर  जुबान कहते हो कि हाल-ए-दिल बायाँ करो….”

    pawansrivastava के द्वारा
    May 2, 2012

    जुबान नहीं काली जुबान काटी है

D33P के द्वारा
May 2, 2012

पवन जी इतनी रात को आपका लेख आरम्भ करने पर मुझे भी लग रहा है कि मैंने पवनपुत्र से पंगा ले लिया है वैसे तो आपकी लेखनी के आगे हम नतमस्तक है फिर भी कुछ लिखने का दिल कर रहा है पर आज नहीं आपका पूरा सामान पढने के बाद ,,,,,,शुभ रात्रि

    pawansrivastava के द्वारा
    May 2, 2012

    आपके लेख का बेसब्री से इंतजार रहेगा …कृपया लिखने के बाद ज़रूर सूचित कीजियेगा ….औरआप भी देर रात तक जगी रहती हैं ….’या निशा सर्व भूतानाम तस्यां जागृति संयमी ‘रात में जब सारे चर अचर सो जाते हैं साधक जग कर अपनी साधना में लीन रहते हैं

    D33P के द्वारा
    May 4, 2012

    वास्तव में सरकारी फरमानों में पूरा दिन निकल जाता है और शाम आला कमान की हाजिरी में और उसके बाद निर्विघ्न समय रात्रि का ही होता है और लिखने पढने का आनंद भी उसी समय आता है !पर उस समय बड़ा ब्लॉग पढने में थोडा आलस भी आता है वो भी तब जब उसमे कई विषय समिल्लित हो, दिमाग कभी इधर दौड़ता है कभी उधर (आप इसे अन्यथा न ले ,पागल मन बके दनादन )आपकी लेखनी उत्तम है ..

    pawansrivastava के द्वारा
    May 4, 2012

    दीप्ती जी दोस्तों के बीच औपचारिकता नहीं होती

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 1, 2012

लैपटॉप वाले भईया नमस्कार, क्या गज़ब का लिखते हो …… वास्तव में आप सूफी हो . ईश्वर ने आप को ज्ञान दिया है सदैव ही उसका उपयोग ही करियेगा .

    pawansrivastava के द्वारा
    May 2, 2012

    अरे यह नाचीज तो बस नाचीज हीं है …यह आपका प्यार है जिसकी वज़ह से आपको मुझमे कुछ खास दिख रहा है .

May 1, 2012

भाई आपका आलेख पढ़ा, यही चीज मैं भी लिखना छह रहा था . पर कोई फायदा नहीं क्योंकि जब लोग सत्य को देख कर स्वीकार नहीं करना चाहते तो सुनकर और पढ़कर क्या खाक करेंगे. यहाँ तर्क करने वालों के सामने बात राखी जा सकती है कुतर्क करने वालो के सामने नहीं…..और जहाँ तक आपका और मेरा सवाल है हम न ही सुनकर और न ही पढ़कर विश्वास कर सकते हैं क्योंकि जो आखों से देख रहे है उससे इंकार नहीं कर सकते……….फिर भी कहूँगा एक अच्छी कोशिश अंधों को जगाने की ….

    pawansrivastava के द्वारा
    May 2, 2012

    अनिल भाई ….नहीं जागेंगे तो आप जैसा बब्बर शेर है न अपनी दहाड़ से सबको जगाने के लिए

rekhafbd के द्वारा
May 1, 2012

आदरणीय पवन जी ,आपके इस भानुमती के पिटारे में बहुत अनमोल रत्न भरे हुए है ,एक एक निकालने में बहुत समय लग रहा है ,बहुत ही बढ़िया रचना ,बधाई

    pawansrivastava के द्वारा
    May 2, 2012

    रेखा जी ,तहे दिल से शुक्रिया आपका

vikramjitsingh के द्वारा
May 1, 2012

पवन जी….नमस्कार हमारे पंजाब में एक कहावत है, ”सौ हत्थ रस्सा…..सिरे ते गंड” (100 हाथ रस्सी-और उसके आखिर छोर पर गाँठ) मतलब बात जितनी मर्ज़ी लम्बी हो जाये….लेकिन आखिर तो, कभी न कभी तो, उस पर पूर्ण विराम लगेगा ही लगेगा…….. बहुत दिनों से देख रहे थे, इस मंच पर घमासान हो रहा है…..कोई एक, दूसरे की बात से सहमत ही नहीं होता दिखाई दे रहा था……आज आपका ये आलेख ”रस्से की गंड” का ही काम करेगा……..मतलब पूर्ण विराम…… अब देखें कौन-कौन समझता है इस बात को……..आपने तो समझाने में कोई कोर-कसर नहीं रखी…… आपकी सभी बातें तर्कपूर्ण और सच्चाई के बेहद करीब हैं……. हमारी तरफ बधाई…….

    vikramjitsingh के द्वारा
    May 1, 2012

    कृपया ”हमारी तरफ से बधाई…….” पढ़ें…. धन्यवाद…..

    pawansrivastava के द्वारा
    May 2, 2012

    विक्रम जी आप जैसे दोस्तों का समर्थन हुलसा बुलंद कर देता है

    pawansrivastava के द्वारा
    May 2, 2012

    विक्रम जी आप जैसे दोस्तों का समर्थन हौसला बुलंद कर देता है

mparveen के द्वारा
May 1, 2012

पवन जी नमस्कार, पहली बार मौका मिला है आपकी रचना पढने का …. पहले तो ब्लॉग का नाम लैपटॉप वाला सूफी मुझे खिंच लाया की देखे सूफी जी क्या कह रहे हैं तो ब्लॉग पर आने के बाद पता चला की बिना पढ़े जाने का तो सवाल ही नहीं है …. क्या हिप्नोटैज़ किया आपने अपनी बातो से …. अछि रचना है … हम इंसानों की एक सबसे बड़ी कमी यही होती है की हम ज्ञान देना जानते हैं और लेना भी जानते हैं पर उसका प्रयोग करना नहीं .. यानि अच्छा अच्छा कहेंगे लेकिन क्या अच्छा अच्छा कर पाते हैं ……. वो शोलगी भरी कैफ़ियत और सीरी ज़ुबान वाली शख्सीयत: वो लुभावने ज़िल्द में छिपी घटिया दास्तान वाली शख्सीयत: वो काली सोंच और सफ़ेद गिरेबान वाली शख्सीयत: वो बेचकर गैरत और ईमान ,हुए महान वाली शख्सीयत: अगर ऐसे बनती है शख्सीयत तो हम गुमनाम भले युहीं लिखते रहें हमेशा…..

    pawansrivastava के द्वारा
    May 1, 2012

    प्रवीण जी …आपसे नए टी शर्ट का पैसा लूँगा …..आपने तारीफ करके मेरा सीना इतना फुला दिया है कि पुराना टी शर्ट आ हीं नहीं रहा :) :)

yogi sarswat के द्वारा
May 1, 2012

बहुत खूब !

    pawansrivastava के द्वारा
    May 1, 2012

    धन्यवाद योगी जी

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 1, 2012

पवन जी नमस्कार , मैं बहुत हर्षित हूँ … आपमें अपनी जिम्मेवारी को समझा और आपकी कविता के बाद से शुरू हुए विवाद (क्योंकि समझ ने वाले कम थे गरियाने वाले ज्यादा इस लिए :) ) को एक सार्थक मोड़ पे लाकर छोड़ा है / बहुत जरुरी था आपका विस्तार पूर्वक बातो को रखना … मैंने अभी अभी संदीप जी के ब्लॉग में लिख के आ रही हूँ की सभी बुध (ज्ञान ) की तरह होते (पूर्वाग्रह को छोड़ नयी सोच को सचने और जानने के उत्सुक ) या फिर रजनीश की तरह तार्किक मीमांशा के धनी तो दुनिया ऐशी नहीं होती कब की बदल गयी होती .. पर विचारों की लड़ाई है ..और मानसिकता को भी बदलने की तो थोडा धर्य तो रखना ही होगा .. क्योंकि हमेशा से परिवर्तन समय और सयम दोनों मांगती है ……. अतः हमारा कर्तव्य है की .आहत होने के बाबजूद भी अपने विचारों को सामने रखते रखे …. एक दिन सभी मानसिक अवरोध और अपने जिद्दी विचारो से हट कर हर पहलु को खुल कर देखने और कहने की हिम्मत में शामिल हो जायेंगे ……. आमीन आपकी कविता तो बस .. कुछ कहने नहीं देती है .. निशब्द करती है ……….. बहुत -२ बधाई आपको

    pawansrivastava के द्वारा
    May 1, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया महिमा जी ….आपके लेख को पढने की उत्सुकुता हिचकोले मार रही है

Madhur Bhardwaj के द्वारा
May 1, 2012

बड़े भाई पवन जी, नमस्कार, मुरीद कर लिया भाई आपने हमें, आपने तो सारा सच ही कह दिया, इसे पड़ने के बाद तो किसी को कुछ कहने के लायक ही नहीं छोड़ा आपने…पड़कर बहुत अच्छा लगा, इस लेख के लिए मेरी और से हार्दिक बधाई… बस इतना निवेदन करूँगा की अपने इस छोटे भाई पर अपने आशीष की वर्षा करते रहें…..! क्यूंकि आज के ज़माने में समंदर के तल से सुई ढूँढा जा सकता है पर विवेकशील आदमी को ढूँढना नामुमकिन है …..छिछले ज्ञान का छदम आवरण ओढ़े ज्ञानी तो कई मिल जायेंगे पर वो ज्ञानी विरले मिलेंगे जिनके ज्ञान में सच का आत्म-स्वीकृति हो ,जिनके ज्ञान उस हीरे जैसा हो जो सच के खराद पे चढ़ के चमकता है ..जो सच को कहने के लिए थोथे दलील का सहारा नहीं लेता … जो निज मन को टटोलता है फिर कहता है ,वही जो उसने अवचेतना के सूक्ष्म स्तर पे महसूस किया है ….मन एक अथाह समंदर है और ज्ञान का हीरा मन के अवतल पे रक्खा है….छिछले गोते से कम नहीं चलेगा …गहरे में जाना होगा ….अवचेतना के गहरे स्तर को ज्ञापित करना हीं तो ज्ञान है ……!

    pawansrivastava के द्वारा
    May 1, 2012

    मधुर जी मेरी हार्दिक शुभकामनाएं आपके साथ है ….आप भाई बन कर सदैव हिरदय में रहेंगे

चन्दन राय के द्वारा
May 1, 2012

मित्र , आप इक जबरदस्त रचनाकार है , कम से कम आपकी कलम के कायल लोगो में मेरा नाम लिख लेना भाई , बाकि समय होता नहीं तो अपने मतलब का पढ़ लिया , आप कविता नहीं लिखते , बल्कि ले जाते हैं शब्दों संग दूर कंही दूर , जन्हा से वापिस आने में वक़्त लगता है , आपका मित्र

    pawansrivastava के द्वारा
    May 1, 2012

    किस किस चीज के लिए आपकों धन्यवाद कहूँ ….आपके मुक्त कंठ से की गयी प्रशंशा के लिए या अपने मित्रता का अनूप सौगात देने के लिए

sadhna के द्वारा
May 1, 2012

देखिये कितना समझ में आता है….. अगर अभी भी नहीं आया तो खुद experience करके तो आ ही जायेगा…. तब आप दोनों की एक एक लाइन याद करेंगे सब….. वैसे मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि इतना अंधविश्वास कैसे हो सकता है लोगो को अपने “ईश्वर” पे…..खैर….. no more टिपण्णी…..now.

    sadhna के द्वारा
    May 1, 2012

    “कलमकारी ठीक ठाक कर लेता हूँ तो तय है की नहले पे दहला फेंकूंगा” I loved this line.. :) :)

    pawansrivastava के द्वारा
    May 1, 2012

    Are nahi saadhana It is a sweet tiff …बस ज़रा सा वैचारिक मतभेद है ….सब प्यारे हैं ,सब अपने हैं

dineshaastik के द्वारा
May 1, 2012

सच  कहा व्यक्तिगत  आलोचना कोई नहीं सह पायगा, आलोचना का पलटवार करूँगा, धमकी दोगे तो सच  कोई नहीं कह पायगा। शिष्ट आलोचना नये विचारों की माँ होती है, सच्चा विचारक  आलोचना करने से नहीं रह पायगा। संदीप जी की अधिकांश  बातें सटीक  हैं मैं जानता हूँ, पर  किसी पर व्यक्तिगत  टिप्पणी करना ठीक  नहीं है मैं मानता हैँ, माँ महान  होती है, यह सच है। पर हर माँ महान होती है इसका यह तो नहीं है अर्थ। मुझे अपनी माँ में भगवान  नजर आते यह तो नहीं है व्यर्थ। आदरणीय  पवन  भाई, तार्किक  विश्लेषण  के लिये बधाई…

    pawansrivastava के द्वारा
    May 1, 2012

    आप तो सच कहेंगे ,आप तो दोस्त के नाते हक बनता है दिनेश जी

sinsera के द्वारा
May 1, 2012

ऐ राह – ए – नाख़तम कब तक तुम्हारे साथ चलूँ, थक गए पाँव कि अब और चला नहीं जाता, छाँव पाई नहीं पैरों में छाले ही मिले, जाने कितना अभी चलना है , कुछ नहीं है पता , दश्त ही दश्त यहाँ , समंदर ही समंदर है वहां, इतना पानी है मगर खुश्क गला रह जाता, न जाने क्यूँ समझ बैठे कि “हम तो बादल हैं”, खुश्क सहरा हैं बहुत बाद में मालूम हुआ …..

    pawansrivastava के द्वारा
    May 1, 2012

    आपने मेरा इतना लम्बा ब्लॉग इतने कम समय में शायद हीं पढ़ा होगा पर यह जान कर अच्छा लगा की आप भी हमारी तरह हैं – सपने सिरहौने पे रखकर हम शब् गुजारी करते हैं , हम वो जुगनू हैं जो तमाम शब् जलते हैं

    sinsera के द्वारा
    May 1, 2012

    एक एक लाइन पढ़ी है लेकिन चर्चा परिचर्चा से थक गयी हूँ…इसी लिए कहा कि थक गए पाँव कि अब और चला नहीं जाता… थोडा आराम चाहिए…. botox treatment एहसास पर नहीं होता ना….

    pawansrivastava के द्वारा
    May 1, 2012

    पर आपके बातों का चुलबुलापन देख कर तो लगता है की आपके विचारों का भी बोटोक्स हुआ है


topic of the week



latest from jagran