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पागल मन बके दनादन

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मैंने GOD से पंगा ले लिया

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एक सपना शुरू हुआ
और शुरू हुआ
झीने पलकों के अन्दर
कल्पनाओं के व्यपगत विचार
जिस पर मन की गोरैय्या
नित प्रतिदिन
तिनकों के ताने बाने बुनती ….
और एक दिन
एक प्रचंड हवा बही यथार्थ की
और सब ख़त्म
कहीं इश्वर भी उस ढहते टूटते
स्वप्निल अधिवासों के
ऐश्वर्य सा तो नहीं
जिसे मैंने कभी भोगा हीं नहीं

हाँ कहाँ भोगा है इश्वर को मैंने ? कहाँ देखा है इश्वरत्व या इश्वर की अनुकम्पा मैंने जो मान लूं इश्वर को मैं

अनूप अवलोक्य जीवन के
पारगम्य पारलौकिक तथ्य
अंतर उद्भुत यक्ष-प्रश्न के
अनगिनत अनुत्तरित सत्य
जीवन और मृत्यु का वृतांत 
न जाने कितने ऐसे
गहन गुढ सिर्धान्त
मनस्वियों का मुनित्व और
मर्मग्यों की मिमांसा ,
तपस्वियों का तप और
दार्शनीकों की विवेचना
अनेक उत्क्रम अनेक उद्धम
अप्राप्य रहा पर ईश्वर
और आत्माओं के ज़्वर
बने रहे निरंतर

हाँ मेरे आत्मा का ज्वर तो अनवरत बना  हुआ है …..कहां दिलाई निजात खुदा ने मुझे मेरे सोग से …कहते हैं मौला समंदर है और इंसा दरिया-ए-पायाब  …..तो कहाँ मिला समंदर मुझे ?….विषमताओं की जेठिली धुप मेरे प्राण बूंदों को सुखाती जा रही है …कहाँ कोई इश्वर मेरे रक्षार्थ आ रहा ?
 
दरिया-ए-पायाब हूं मैं ,एक समन्दर तलाश रहा हूं
मैं गर्दिश-ए-अय्याम में,अपना मुकद्दर तलाश रहा हूं

चलो मैं हतभाग्य हूँ या मेरे करम में खुदा का मेहर नसीब नहीं पर एक अबोध बच्चा जिसके हाथों की लकीर भी ठीक से दृष्टिगोचर नहीं होती…. उसे उसके बाप के द्वारा मार दिया जाना खुदा का कौन सा करम है ?फिर तो खुदा यही कहूँगा कि -

आत्म-स्वीकारोक्ति मेरी
मेरा अपार्थिव विश्वास
तुम्हारे पार्वत्य प्रकृति के
समक्ष हारा
क्षितिज पे तैरता ज्योत
और अन्य ऐसे
अपहूंच आभास और
संतृप्त हुई अटकलें
तुम्हारे होने की
‘वह इश्वर हीं उद्भूत
करता होगा जीवन’
अतीत के गर्भ में
पनपा यह विश्वास
विरासत में मिला मुझे
आज किन्तु
आत्म-स्वीकारोक्ति मेरी 
मृत्यु के इस
महा-क्रंदन के मध्य
आत्म-स्वीकारोक्ति मेरी 
मेरा अपार्थिव विश्वास
तुम्हारे पार्वत्य प्रकृति के
समक्ष हारा

”ऐश में यादे खुदा नहीं और तैश में खौफे खुदा नहीं ”….मानता हूँ  खुदा कि कुछ बन्दे ऐसे होते हैं…उनके खुदा के मानने में मतलबपरस्ती होती है

उस दिन जब नभ में दामिनी
नागिन सी बलखा रही थी,
उस दिन जब झंझा
रौद्र रूप में गा रही थी,
जब लग रहा था कि
आसमान से प्रलय टूट पडेगा
और चुन चुन के
सबके प्राण हरेगा ,
उस दिन हर किसी के सांसों में
मंत्रों का गुंजन था,
प्रार्थनायें थी,दूआयें थीं और
त्राही-माम का क्रंदण था
पर जैसे हीं प्रलय का
खतरा टल गया,
हर किसी के ह्रिदय से इश्वर
जाने कहां निकल गया .

पर खुदा तुम्हे ऐसे मतलब परस्तों की नाअहली याद रहती है पर अपने आदिलों की साजिदगी नहीं ….तुम्हे पता है तुम किस किस के खुदा हो ? …..वो गरीब बच्चे जो अपनी निस्तेज,निष्प्राण भूखी माँ के सूखे स्तनों से प्राण की चंद बुँदे भी नहीं खींच पाते हैं,उनके भी खुदा हो तुम …..उस माँ के भी खुदा हो तुम जो अपने मृत शिशु के मांस के लोथरे को सीने से चिपकाये महा-विलाप करती है ….उस महा-विलाप में भी तुम्हारे हीं नाम का नालाहा होता है खुदा ….तुम उस आशिक के भी खुदा हो जो ताउम्र तुम्हारी इबादत करता रहा ,तुमसे अपनी माशूका का कुर्बत मांगता रहा पर जिसे मिला तो सिर्फ हिज्रे-सनम …दर्द में सना शामे-फुरकत …..सुनो एक आशिक तुमसे क्या कहता है :

कभी राहे-इश्क पे ए रब ठहर के देखना ,
कभी यार से ए रब बिछ्ड. के देखना
कभी हिज़्र की एक रात गुज़ार के देखना
कभी अश्क की बरसात गुज़ार के देखना
ए खुदा कभी देखना तू बन के हमसा
ए खुदा कभी देखना तू बन के हमसा

तुम्हारे हीं मेहरबानी का नतीजा है कि अब इश्क भी बस ग़ज़लों के काफिया में महदूद रह गया है और खुदा तुम भी विप्र के अन्गोछियों में खुदे रह गए हो ….तुलसी के चौपाइयों में सिमटे रह गए हो :

अब कहां परिसीमित करते तुम हरी                                                                                        गालियों के संख्याओं को
हर शिशूपाल जब इसे शतशत दुहरा रहा ,
हर दु:शासन चौराहे पर
लूटता द्रोपदी का लज्जा-वसन ,
अब कहां कोई किशन उनके रक्षार्थ आ रहा

तुलसी के चौपाईयों से ऊतर आओ राम
कि उतर आओ विप्र के अंगोछियों से खुदे कृष्ण ,
मिथकों के स्वामी तुम गहरे बसे आत्माओं में
या आत्ममुग्धीकरण के दशाओं में,
यथार्थ भव: राम ,यथार्थ भव: कृष्ण
कि तुम अगर कल्पगाथाओं के नायक तो भी
तुम्हारा सज्जनतव कभी अनुवर्तित नहीं हुआ ,
हां रावणत्व अपने वृद्धिमान  भुमिकाओं में
अपने अनगिनत अनुषंगियों के साथ छाता जा रहा.

तुम हो या नहीं पर तुम्हारे नाम का बाज़ार खूब चल रहा है खुदा ….सब खुदा बने बैठे हैं यहाँ …यहाँ तो आलम ये है कि -

यह दुनियां सब के ठेंगे पे है
यहां सब सब के मिर्ज़ा जी हैं
यहां सब के शान शहाने हैं
यहां सब खुदा-ए-मजाज़ी हैं

यह तो भला हो मेरे ठोकर खा खा कर संग्रहीत अनुभवों का कि मैं महात्म्य के हिज़ाब के पीछे छिपे अय्यारी को समझने लगा हूं ….जिस चेहरे पे मैं कल तलक रब देखता था,रियाज़त देखता था,अब उसी  चेहरे पे नाअहली देखने लगा हूं:ए काश वो सचमुच कि वो सचमुच पीर होते  …..पाखंडी बाबाओं के लिए अपने एक शेर के ज़रिये यह कहना चाहूँगा क़ि -

बन कर खुदा तू मेरा क्या मुकद्दर लिखेगा
मैं पीर-मुर्शिद हूँ मुझे पाखंड-शनासी आती है

खुदा तू गुलफाम है और यह दुनिया तेरी बगिया …..सम्हाल जा खुदा क्यूंकि -
        
ए गुलफ़ाम तेरे बाग के मंज़र बदलने लगे हैं’
फ़ूल मुरझाने लगे हैं,अब खार उगने लगे हैं

आखिर में एक बात कहूँगा खुदा कि जब तक हमारे आँखों में सपने हैं तू है ….जिस दिन इन्सान बेनियाज़ हो गया तेरा वजूद भी ख़त्म हो जायेगा -

हमारे हसरतों के दम पर ए खुदा तेरी हस्ती है,
वरना बेनियाज़ों का सुना है कोई खुदा नहीं होता.

इसलिए खुदा

न सता बेदर्द तेरे
चाहने वाले को
तेरे सितम से चाहत
कहीं रूठ न जाये;
आ जाये आँखों में
अश्क कि कहीं भूल से
डर ओ बेमुरब्बत कि
कहीं तू डूब न जाये :

 

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
May 1, 2012

पवन जी, नमस्कार ! बहुत सुन्दर रचना कहते हैं आप ! आपको पढ़ना ऐसा लगता है जैसे दीवारों में चुने इबादत के शब्द अंकित है ओर हम उसे समझने की कोशिश करते करते कब शब्द बन दीवारों में ही चस्पा हो जाते है और अचानक कोई आके आपके कंधो को हिला कर वापस .. आपको हकीकत में ला देता ..है ..मैं तो बिलकुल खो गयी . जाने कितनी बार पढ़ गयी … कवी महोदय शुक्रिया .. आपकी लेखनी को … ईश्वर जरुर आपकी पुकार सुन रहा होगा…. आमीन

D33P के द्वारा
April 29, 2012

पवन जी क्षमा करियेगा मुझे लगता है मुझे ये पढने का काम किश्तों में करना पड़ेगा

    pawansrivastava के द्वारा
    April 29, 2012

    सौदा फिर भी घटे का नहीं है …हम तो ज़िन्दगी भी किश्तों में जी रहे हैं …सूद की तो बात छोडिये मूल भी नहीं चूका पा रहें ….Defaulter हो गए हैं …..कहीं खुदा अपनी दी ज़िन्दगी न ज़ब्त कर ले

pawansrivastava के द्वारा
April 28, 2012

दोस्तों ! ….मेरी कविता तुलसी के चौपाइयों से उतर आओ राम में ‘गालियों के संख्याओं को ‘ वाक्य छुट गया था जिससे कविता की पूरी तरतीब बिगड़ गयी थी ….सुधार कर दिया है ….अब पढ़ें

akraktale के द्वारा
April 28, 2012

आदरणीय पवन जी नमस्कार, चलो मैं हतभाग्य हूँ या मेरे करम में खुदा का मेहर नसीब नहीं पर एक अबोध बच्चा जिसके हाथों की लकीर भी ठीक से दृष्टिगोचर नहीं होती…. उसे उसके बाप के द्वारा मार दिया जाना खुदा का कौन सा करम है ? .. उस दिन हर किसी के सांसों में मंत्रों का गुंजन था, प्रार्थनायें थी,दूआयें थीं और त्राही-माम का क्रंदण था पर जैसे हीं प्रलय का खतरा टल गया, हर किसी के ह्रिदय से इश्वर जाने कहां निकल गया . बहुत सुन्दर पंक्तियाँ. सर्व बोधी इश्वर को भी शायद पढ़कर उसका कर्तव्य बोध हो गया होगा. हिंदी कविताओं में इतना अधिक उर्दू का मिश्रण क्वचित ही होता है किन्तु आपने कविता के प्रवाह को बरकरार रखते हुए जो मिश्रण किया है वह काबिले तारीफ़ है. इसीलिए शायद कहा जाता है की कविता की अपनी ही भाषा होती है. बधाई.

    pawansrivastava के द्वारा
    April 28, 2012

    आप जैसे दोस्त हीं हैं जो मेरी कलम में हमस भरते हैं और फिर मुमकिन हो पाता है कुछ आफताबी लिखना

April 28, 2012

यथार्थ अर्थपूर्ण शब्द देने की सार्थक कोशिश जिसमे आप शत प्रतिशत कामयाब होते हुए समाज के ऊपर चढ़े मुखौटे को हटाकर उसका चेहरे की हकीकत को बाखुदा एक सुन्दर अंजाम दिया है…….हार्दिक आभार……यदि वक्त मिले तो मेरी भी एक छोटी सी कोशिश के लिए अपना बेशकीमती दीजियेगा. बस यह एक निवेदन है…..इसे मेरी धृष्टता मत समझिएगा…………….एक बार फिर आपका हार्दिक आभार. http://merisada.jagranjunction.com/2012/04/24/%E0%A4%88%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A4%AC-%E0%A4%9C%E0%A4%97-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A5%A7/

    pawansrivastava के द्वारा
    April 28, 2012

    पढ़ आया अनिल जी और पसंद भी आया

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
April 28, 2012

पवन जी नमस्कार- चन्दन जी से सहमत हूँ. कविता में दम है. पर उहापोह की स्तिथि बनी हुई है. अन्यथा न ले . विचार भावुक कर देने वाले है. पूरी कविता सुन्दर भावात्मक शब्दों से सुसज्जित है. अच्छा लगा. मेने भी एक कविता पोस्ट की है आप पदियेगा.

    pawansrivastava के द्वारा
    April 28, 2012

    आपके लेख का तो मुरीद हूँ …लीजिये साहब अभी पढ़ आता हूँ

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 28, 2012

पवन जी आपको पढ़ना लगता है जैसे दीवारों में चुने इबादत के शब्द अंकित है ओर हम उसे समझने की कोशिश करते करते कब शब्द बन दीवारों में ही चस्पा हो जाते है और अचानक कोई आके आपके कंधो को हिला कर वापस .. आपको हकीकत में ला देता ..है ..मैं तो बिलकुल खो गयी . जाने कितनी बार पढ़ गयी … कवी महोदय शुक्रिया .. आपकी लेखनी को … ईश्वर जरुर आपकी पुकार सुन रहा होगा…. आमीन

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    April 28, 2012

    pawan ji is rachana ko padh ne ke baad har baar ye man kar raha hai kash!! ye main aapse sshwar sunti …. aur bich men lambi sans ke saath mantr mugha sa aapke vichaaro ko jo bich -2 men gunthan hai use yek sans aap kahte ……… to baat hi kuch aur hoti ………………. filmo sa yehsas kra rahi hai sunder , ghahan , shabdo se jyada bhav ka bah chalna ….bilkul par allokik anubhav ki tarah…..

    MAHIMA SHREE के द्वारा
    April 28, 2012

    मैंने लिखा था गुरुदत्त की ब्लैक & white filmo ki tarah पता नहीं कहा बिच से गायब हो गया …. आज ये ठीक से काम नहीं कर रहा

    pawansrivastava के द्वारा
    April 28, 2012

    महिमा जी मेरा खुदा तो आप जैसे दोस्तों के कुर्बत में बसा है ….शुक्रिया आपका ….मेरी कविता तुलसी के चौपाइयों से उतर आओ राम में ‘गालियों के संख्याओं को ‘ वाक्य छुट गया था जिससे कविता की पूरी तरतीब बिगड़ गयी थी ….सुधर कर दिया है ….अब पढ़ें …रुचकर लगेगा

sinsera के द्वारा
April 27, 2012

पवन जी , नमस्कार, आप का आर्टिकिल पढ़ते हुए लग रहा है जैसे कोई सपना देख रही हूँ…जिस तरह सपना शुरू होता है दरिया से , फिर जंगल, आसमान और न जाने कहाँ कहाँ से होते हुए अपने पुराने घर के किनारे वाले कमरे में ला कर खड़ा कर जाता है . उसी में आप अचेतन रूप से सोते, जागते , हँसते , रोते रहते हैं और चेतना को पता भी नहीं चलता…(अब ये मत पूछिये गा की चेतना कौन है?)और जब नींद खुलती है तो मुंह से निकलता है…”या खुदा….ये सपना था या हकीक़त “

    pawansrivastava के द्वारा
    April 27, 2012

    Sarita ji ! शुक्र है कि आपको ये भूल-भुलैया नहीं लगा …..रही बात चेतना के बारे में पूछने की तो चेतना को तो मैं जानता हूँ …..आपके दिमाग में रहती है चेतना …It is your concious mind which makes you read the implicit ,the unseen -something that is written between the lines….If not you too would have ended doing scathing coment on this blog of mine …I am really thankful to you from the core of my heart .

    sadhna के द्वारा
    April 28, 2012

    अरे सरिता जी, ऐसे कैसे I Quit ….संदीप जी का ब्लॉग छोड़कर कहाँ जा रही हैं आप….? Am sorry for whatever i said yesterday…. am not suppose to speak all that…. आप चली जाएँगी तो अच्छा नहीं लगेगा….. चलिए अपनी बेटी की उम्र का समझ कर ही माफ़ कर दीजिये ….. अगर इसमें कान पकड़ कर सॉरी बोलने का emoticon होता तो मैं वो डालती….

Mohinder Kumar के द्वारा
April 27, 2012

पवन जी, मुझे लगता है आप मेरी टिप्पणी से बहुत आहत हुये हैं इसके लिये में क्षमा प्रार्थी हूं. आपने इसे जिस नजर से लिया मेरा वो अभिप्राय कतई नहीं था. मेरा मनत्व्य केवल इतना था कि इस कविता को थोडा छोटा और संयत किया जा सकता था जो किसी एक विषय विशेष के इर्द गिर्द रहती और एक सुन्दर सा शीर्षक भी होता. हिन्दी और उर्दू का मेल भी अच्छा लगता है परन्तु यदि हिन्दी के कलिष्ट शब्दों का प्रयोग न कर हल्के शब्दों का प्रयोग किया जाये. जहां तक भाषा की बात है हिन्दी और उर्दू पर मेरा समान रूप से अधिकार है. मेरा यह मानना है कि लेखक के लिये आलोचक प्रशंसकों से अधिक उपयोगी होते हैं. जब हम कोई रचना लिखते हैं तो उसमें सिर्फ़ हमारे बिचार का पक्ष होता है जवकि पाठक आलोचना व टिप्पणी से उस को बहुआयामी बना देते हैं एक बार फ़िर से क्षमा प्रार्थी हूं यदि आपको मेरा नजरिया ठीक न लगे.

    pawansrivastava के द्वारा
    April 27, 2012

    मोहिंदर भाई आपके विनम्रता के आगे नतमस्तक हूँ …भावावेश में जो कटु-शब्द कह गया उसके लिए हिरदय से क्षमा चाहता हूँ ..भाई अगर आप मेरे ब्लॉग का पुनरावलोकन करें तो आप पाएंगे की समष्टिगत रूप में निसंदेह mere ब्लॉग में हिंदी और उर्दू का समावेश है पर इन कविताओं को अगर आप स्वतंत्र रूप से देखेंगे तो पाएंगे कि हिंदी की कवितायें अलग हैं और उर्दू के शेर अलग ..उनमे कहीं कोई घाल मेल नहीं …..क्या करूँ समयाभाव के कारण प्रथम प्रयास में जो स्वेच्छाचारी विचार पनपते हैं उन्हें बगैर किसी लग लपट के ,बगैर किसी अलंकरण के लिख जाता हूँ ….वक़्त ने इज़ाज़त दी तो कभी सोंच के कुछ लिखूंगा ….

चन्दन राय के द्वारा
April 27, 2012

पवन जी , मित्रवर इश्वर की मनोदशा सोचीय , जिसे हर कोई उतनी ही शिद्दत से मांगता है , इतना देने के बाद भी हम उसके मेहर को भी हम कोसते है , आपकी कविता जैसे किसी उहापोह में है , भाव बिखरे से पड़े है , यह मन के सत्य उदगार है , कृपा स्वस्थ रूप में ले

    pawansrivastava के द्वारा
    April 27, 2012

    चन्दन भाई आपकी सलाह सर आँखों पे ….आपने सच कहा भावें बिखरी हुई हैं पर अगर आप इस कविता में निहित मेरी मनोदशा देखें तो आप पाएंगे की मैं सचमुच इश्वर के अस्तित्व को लेकर विहंगम की स्थिति में हूँ …मेरा एक अंतरभाव कहता है की इश्वर हैं …एक अंतरभाव कहता है की इश्वर नहीं …फिर ऐसा भी लगता है की इश्वर है पर उसकी कृपा नहीं ….इश्वर विनय की रागिनी ,सृजन का तान बजाना भूल गया है …उसे अब बस संहार का सुदर्शन चलाना ही आता है ….वह भी बेकसों पर .मज़लूमो पर …आतताइयों पर अब उसका कोई जोर नहीं चलता ….अब इतने सारे परस्पर विरोधी भावों को ढ़ोती कविता में एकात्मकता कहाँ से रहेगी ….मेरे ख्याल से अगर यह कविता समरूप होती तो मेरे अभ्यंतर अंतर्द्वंद को ,मेरे बहकते ख्यालों,मेरे मन के उहपोह को ढ़ो नहीं पाती …..एक और चीज गौर कीजियेगा ..मैंने अलग अलग कविताओं के ज़रिये अपने अलग अलग भावों को व्यक्त किया है :)

Mohinder Kumar के द्वारा
April 27, 2012

पवन जी, आप ने God से नहीं पाठकों से पंगा लिया है. मेरी तो यह समझ में नहीं आ रहा कि यह एक रचना है या पूरी किताब. अन्त तक जाते जाते यह भूल गया कि शुरु में क्या पढा था. साथ ही हिन्दी और उर्दू को इस तरह से घोल दिया आपने कि मजा किरकिरा हो गया. यह मेरी व्यक्तिगत राय है. इसे अन्यथा न लें.

    sadhna के द्वारा
    April 27, 2012

    Mohinder ji, यह एक रचना है एक paragraph नहीं…. :) और हिंदी में जब उर्दू का तड़का लगता है तो बहुत ही सुन्दर रचना बनती है…. ये मेरी भी व्यक्तिगत राय है कृपया अन्यथा न ले……

    pawansrivastava के द्वारा
    April 27, 2012

    मुझे मालूम है अनर-गलर बातें करके आप मेरी देहरी में झाँकने ज़रूर आयेंगे …यह देखने कि जो थूक अपने आसमान में ऊँचा फेंका है ..वह कितना ऊँचा गया है ….तो मेरी मानिये दूर हट जाइये कहीं देखने के चक्कर में थूक आप हीं पे न आ गिरे …आसमान तक पहुचने से तो यह रहा ‘यह मेरी व्यक्तिगत राय है. इसे अन्यथा न लें.’ अन्यथा तो लूँगा मोहिंदर साहब क्यूंकि आपकी कथनी करनी में अंतर है ….एक तरफ आप कहते हैं कि मैंने पाठकों से पंगा ले लिया (जैसे कि आप सारे पाठकों के पसंद -नापसंद को जाने वाले अंतर्यामी हो गए….अजी साहब अपने ठीक ऊपर लिखे टिपण्णी को तो पढ़ लिया होता ) और दूसरी तरफ आप दावा करते हैं कि यह आपकी व्यक्तिगत राय है …और जहाँ तक हिंदी उर्दू के घालमेल कि बात है तो यह कविता मैंने आपकी सुगमता के लिए नहीं लिखी है …..आपको लम्बी लिखी बातें याद नहीं रहती….तो आप अपने इस मूषक स्मृति के लिए किसी वैद्य-हकीम को दीखाइये ,मेरा मूड क्यूँ ख़राब कर रहे हैं ….. P.S-मैं इन्सान पहले हूँ और लेखक बाद में … तर्क संगत आलोचना सह सकता हूँ ,कुतर्क नहीं ….लम्बी कवितायें लिखना ,हिंदी और उर्दू के शब्दों को साथ साथ संयोजित करना अगर इसे आप मेरे लेख कि त्रुटी कहेंगे तो मुझे यह आपकी …….. के सिवा कुछ नहीं लगेगा …यह रिक्त स्थान …….मैंने इसलिए लिख छोड़ा है कि इसे आप और यहाँ आने वाले बाकि लोग अपनी सुगमता के हिसाब से भर सकें ….भगवान् के लिए अब आगे मुझे छेडिएगा मत ….वरना आप मेरा वक़्त और मेरी स्याही दोनों बर्बाद करेंगे ..Because I believe in paying in same coin .

sadhna के द्वारा
April 27, 2012

“शर्म आनी चाहिए मुझे कविता लिखते हुए….. वाकई कितना गन्दा लिखते हैं हम…..” इसे पढने के बाद तो यही लग रहा है….. :) very very very very…….. upto infinity….. good…. :)

    pawansrivastava के द्वारा
    April 27, 2012

    महत्व कविता का नहीं ,महत्व कविता में प्रतिपादित विचारों का होता है …और विचारों के सम्प्रेषण में साधना आप किसी से कम नहीं :)

    sadhna के द्वारा
    April 27, 2012

    Thanks dada!! :) mera college bunk dekha aapne….?

    pawansrivastava के द्वारा
    April 27, 2012

    साधना I will see it right now


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