Laptop wala Soofi

पागल मन बके दनादन

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क्या उसे मारने में आप मेरा साथ देंगे ?

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दोस्तों जब लोगों को मैं मज़हब के नाम पर हेय और हिकारत का पाठ पढ़ाते देखता हूँ ,देखता हूँ जब दो मजहबों के बीच फैलते वैमन्यस्ता को  ,वो जमीं जहाँ कभी सुकूत का दरिया बहता था ,आज वहां शोलों का सैलाब बहते देखता हूँ तो सच कहता हूँ ज़ारो कतार रोता हूँ मैं …इस फोरम पे अपनी चंद कविताओं व नज्मो के माध्यम से आपसे कुछ कहना चाहता हूँ …चाहता हूँ की मेरी सोंच के नहीफ से कतरे को आपके संगत का समंदर मिल जाए और फिर बड़े वेग से बहूँ मैं और बहा दूं हर फिरकापरस्ती को … क्या आप इस फिरकापरस्ती को मारने  में मेरा साथ देंगे ? 
  
 
         १)

ये अच्छी बात है कि खुदा मुंज़मिंद है पत्थर में,
अगर बजिंसहा होता तो देख के दुनियां शर्मिंदा होता
   
      
             २)
तू जो नैपथ्य के ईश्वर के हवाले से
मुझे रंज़ सीखाने आया है,
शंकर का त्रिशूल थमाने आया है ,
राम का गांडिव थमाने आया है;

तू भूल गया कि किस परीपेक्ष्य में
उठा था अस्त्र उनका,
तू भूल गया कि बडा. हीं धर्म-निरपेक्ष
था शस्त्र उनका,
तू भूल गया कि उनके तीर से
किसी फ़िरके का कोई फ़र्द नहीं
बल्कि एक दानव मारा गया था ,
तू भूल गया कि उनके त्रिशूल से
एक निज़न्द,एक गमज़दा
मानव उबारा गया था ;

आज जो चला है तू
धर्म का प्रपंच गढ.
देश की स्मिता बचाने ,
धर्म के नाम पर
हेय और हिकारत की
संहिता सीखाने,
याद रख खंज़रे-हिकारत का
चस्का-ए-लहू
बडा वहशी होता है ,
एक दिन यह अपने हीं हाकिम का
सीना चीरता है,
अपने हीं आका का खूं पीता है.

                ३)
अगर आप सख्त कलेजे वाले हैं
तो कभी अहमदाबाद के गुलबर्ग
के उस खंण्डहर में जाइये
जिसके विराने दयार में अब भी
भक्क से जले मांसों का दुर्गन्ध
भभक उठता है;
जहां जले दरख्तों पे अब भी
कोई कोपल नहीं फ़ूटा है;
जहां बारिशों के कई मौसम
जले मकानो का स्याहपन धो नहीं पाए हैं;
जहां टूटे परकोटों और ज़ंग लगे जंगले
के बाहर बैठा एक बूढा चौकीदार
जाने किसकी रखवाली कर रहा है;
फ़िर कहता हूं कि
अगर आप सख्त कलेजे वाले हैं
तो हीं वहां जाइये क्योंकि
वहां की हवाओं में घुली चित्कारें,
दरीचे से झांकते दर्द
और पेड के ठूठ पे टंगा
किसी बच्चे का टेड्डी बीअर
सच कहता हूं आपके हड्डियों में
सिहरन पैदा कर देगा:
                ४)
उन दिनों एक खुदा था ज़ुरुर जो
किसी मंदिर,किसी कलसे में नहीं ,
किसी मंत्र,किसी कलमें में नहीं
बल्कि दिल के ज़ाविया में रहता था;
तब न पैगम्बरी वक्त था
न कयामत का कोई आसार था,
तब धोखे और छलावे के
पहिये पे न चलता संसार था;

             ५)
ए दोस्तों चलो लौट चलें फ़िर
एक बार हम
अपने बचपन के ज़ानिब
उसी ज़माने में ,
तब जब न आबो-हवा में
कोई तंज़ होता था ,
तब जब हममें फ़िरकापस्ती न
कोई रंज़ होता था ,
जब धूल रक्स करती थी
हमारे बेतकसीर बदमाशियों के साथ ,
और शाखे-गुल थिरकता था
सुन हमारी मासूम किलकारियों की थाप;
जब ज़ुम्मन और ज़ावेद
राम और रमेंश से छीन कर
सीरी वाली रोटियां चाटा करते थे ,
जब हिंदू और मुसलमान
बडे. खुशपोशी से
आपस में ईदी और दिवाली बांटा करते थे ,
तब जबकि गुल्ली-डंडा
और लुका-छिपी का खेल हमें सियासत की
नज़रें-बद से बचाता था ,
तब जबकि
हमें बिना किसी मज़हबी पंख के
उडना आता था.
ए दोस्तों चलो लौट चलें फ़िर
एक बार हम
अपने बचपन के ज़ानिब
उसी ज़माने में .

और आखिर में ऊपर लिखे अपने  रचनाओं के बारे में अपनी एक और कविता के माध्यम से यही कहना चाहूँगा कि -

कितना अच्छा होता जो मेरे स्याही को
किसी इंसां का लहू नहीं,
बल्कि खुल्द,खुलूस,खैर और खुशी का
खुशनूमा रंग मिलता;
मैं लिखता फ़कत अफ़साने
मेलो-मिल्लत के,
कितना अच्छा होता जो मुझे

तंज़ो-तल्खीयत का न कोई प्रसंग मिलता;

PAWAN SIVASTAVA

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43 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
April 14, 2012

बहुत ही सुन्दर रचना है.सच्चाई के बेहद करीब.आज भी विद्यालयों में बच्चे एक टिफिन बौक्स से कई के पेट भर लेते हैं मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है ये वाकया,एक बार नहीं बार-बार.

    pawansrivastava के द्वारा
    April 14, 2012

    आपसे बेहतर इस बात को कौन जान सकता है जिसके क्षत्रछाया में हर रंग के फूल पल्लवित होते हैं

pawansrivastava के द्वारा
April 13, 2012

साधना जी माफ़ कीजियेगा आपकी बात समझ नहीं पाया …लिखा मैंने है तो बेचारे चमनलाल के सर पे ठीकरा क्यूँ फोड़ रही हैं आप :) :)

    sadhna के द्वारा
    April 14, 2012

    क्योंकि आप चमनलाल जी से ही विचार उधार लेते हैं!!! If am not forgtting…. :)

    pawansrivastava के द्वारा
    April 14, 2012

    साधना जी आपसे और संदीप जी से बैटन में जीतना मुश्किल हीन नहीं नामुमकिन है :)

    sadhna के द्वारा
    April 14, 2012

    Actually S’ named people are very intelligent (just kidding)…. :)

    pawansrivastava के द्वारा
    April 14, 2012

    साधना जी सही कहा आपने ….And people whose name begin with ‘P’ letter lags behind the ‘S’ named people by 2 steps :)

    sinsera के द्वारा
    April 14, 2012

    excuse me!!! and what about the people with initial ’s’ following by ’s’………………….. (btw,…..this is sarita sinha speaking……)

    sadhna के द्वारा
    April 14, 2012

    Oh Pawan ji!! Please don’t say this…you are much more experienced than me… (bcz you too have one S :) )

    pawansrivastava के द्वारा
    April 14, 2012

    सरिता जी और साधना जी ! आप दोनों तो हमेशा मुझसे आगे रहेंगी …आप दोनों में double ‘S’ Power है :) :)

pawansrivastava के द्वारा
April 13, 2012

अबोध बालक जी स्कूल की छुट्टी हो गयी क्या …आप तो अपनी बात कहते कहते गायब हो गए

sinsera के द्वारा
April 13, 2012

बहुत खूबसूरत ख्वाब……पूरा होगा क्या……??? बरस रही है आग छाँव कहाँ पाओ गे…. मिराज है वो समंदर न समझना यारो…

    pawansrivastava के द्वारा
    April 13, 2012

    आप जैसी दोस्त का साथ रहा तो ज़रूर पूरा होगा

    abodhbaalak के द्वारा
    April 13, 2012

    पवन जी खूब्सूरात रचना कहना सही नहीं होगा इसे, बल्कि दिल को झाझ्कोरने वाली …………… ऐसे ही लिखे रहें ताकि शायद हम्मे छिप्प इंसान ………….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

krishnashri के द्वारा
April 13, 2012

स्नेही पवन जी , बहुत ही सुन्दर साहित्यिक कृतियाँ .भाव एवं शब्दों का सुन्दर संयोजन , उर्दू -हिंदी का सुन्दर प्रयोग .बधाई एवं मेरी शुभकामना .

    pawansrivastava के द्वारा
    April 13, 2012

    आदरणीय कृष्णा जी ! उत्साह-वर्धन के लिए कोटि कोटि धन्यवाद .

dineshaastik के द्वारा
April 13, 2012

मित्र पवन जी, नमस्कार। पहिले लगता था कि मैं अकेला हूँ, इस  भी़ड़ में इस  तरह से सोचने वाला, अब लगता है कि आज  मिल  है एक  और साथी, अपनी तरह से सोचने वाला, मुझे भी जरूरत है आपके वैचारिक  समर्थन की, क्यों न  हम  समान  विचारधारा के लोग, इस  मंच  पर संगठित  होकर, ला दें एक  क्राँति विचारों की, अनिल  जी का साथ  निश्चित है हमारे साथ, यह प्रतिक्रिया समर्पित है आपकी उच्चस्तरीय  रचना के लिये, एक  निवेदन है, कठिन उर्दू शब्दों का सरल  अर्थ  जरूर  लिख  दिया करें, भावार्थ  समझने में होती है सरलता……

    pawansrivastava के द्वारा
    April 13, 2012

    मित्र दिनेश जी ….आपकी बात सुनकर जोश दुगुना हो गया ….जैसा की आप चाहते थे पेशे खिदमत है आपके :MEANING:खुल्द-Paradise ; खुलूस-Sincerity ,Purity,Intimacy,Affinity. मुंज़मिंद:- जडवत होना ,बजिंसहा- साकार होना

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
April 12, 2012

बहुत सुन्दर कविता. ए दोस्तों चलो लौट चलें फ़िर एक बार हम अपने बचपन के ज़ानिब उसी ज़माने में , तब जब न आबो-हवा में कोई तंज़ होता था , तब जब हममें फ़िरकापस्ती न कोई रंज़ होता था , बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ.

    pawansrivastava के द्वारा
    April 12, 2012

    राजीव जी सराहना के लिए धन्यवाद …! इसी तरह अपनी बेशकीमती राय देते रहें

pawansrivastava के द्वारा
April 12, 2012

अनिल जी क्या करूं,गलतियों के तंतु से बना इन्सान हूँ ,कई बार भावावेश में बह जाता हूँ

April 12, 2012

बेहद शानदार नज्में। मर्मस्पर्शी और हृदयविदारक। राह तो ढूंढनी ही होगी मेरे दोस्ता। ऐसा प्रकृति का स्थाई भाव नहीं हो सकता। सब बदलेगा।

    pawansrivastava के द्वारा
    April 12, 2012

    दोस्त प्रकृति का स्थाई भाव है प्रेम,शांति ….यह इन्सान है जो उसमे खलल डालता रहता है ….बहुत अच्छा लगा की आप आयें …अपने नयी रचनाओं के बारे में अवगत करते रहिएगा ….आपका लाम से लौटा सैनिक पढ़ा था…क्या लिखा हैं आपने ..आफरीन .

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
April 12, 2012

भाई ! वाह, वाह पवन जी, क्या खुबसूरत तरीके से उर्दू व हिंदी का इस्तेमाल करते हुए गंगा जमुनी काव्य धारा का प्रवाह किया है आपने. आपने अपने मन की टीस को बड़े ही सुन्दर दंग से प्रस्तुत किया है. बधाई.

    pawansrivastava के द्वारा
    April 12, 2012

    बस हनीफ साहब आप जैसा दोस्त जीतता रहूँ ,मेरे लिए बड़ी उपलब्धि होगी .

चन्दन राय के द्वारा
April 12, 2012

मित्र नमस्कार , जागरण मंच की चंद सुंदर बेजोड़ नागिनों में आपका नाम निश्चय ही लिखा होना चाहिय आपका मित्र

    pawansrivastava के द्वारा
    April 12, 2012

    चन्दन साहब आपने मुझे चंद सुंदर बेजोड़ ‘नगीनों’ में से एक कहा है या ‘नागिनो’ में से एक …..अगर मुझे ‘नगीना’ कहा है तो मैं असहमत हूँ और अगर ‘नागिन’ कहा है तो साहब आपने मुझे सही पहचाना ….मैं भी खुद को भुजंग मानता हूँ ….. एक तरफ भुजंग विषधर , एक तरफ मानव दर्प धर यकीन मानिये मानव दर्प मेरे विष पे भारी पड़ता है …:)) ….वो कविता जिसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहूचना चाहिए था ,कोपभवन में कूढ़ रही है …..एक आध आप जैसे दोस्त भूले भटके आ जाते हैं उसकी खैरो बरकत पूछने …..मेरे साथ विडम्बना यह है की जब मैं कुछ बड़े निमित्त को साध कर ,कुछ नेक अभीष्ट को लक्षित कर ,कुछ all emcompassing लिखता हूँ तो ठीक उसी दीन संपादक महोदय छुट्टी पे चले जाते हैं …तभी तो जागरण के फीचर ब्लॉग में मेरे ऐसी कविताओं को जगह नहीं मिलती ….मलाल इस बात का है की एक अच्छी बात का अच्छा प्रयोजन सिद्ध नहीं हो पाता…

    April 12, 2012

    pawan bhai,bola tha na ki apani baat yad rakhana. yadi aap jaise vyakti aisi bate karen to shobha nahi deta.aap suraj ho aur suraj ko deepak ke ujale ki jururat nahi hoti…..

April 11, 2012

मैं ईश्वर से दुवा करता हूँ कि आपकी सोच ऐसी ही बनी रहे. नहीं तो यहाँ लोग बाहर से कुछ और अन्दर से कुछ और ही होते हैं. ऐसे में वो दोस्ती निभाते-निभाते कब दुशमनी निभाने लगते हैं . पता ही नहीं चलता. मैं आपके साथ हूँ पर याद रहे यदि आप कभी फिरकापरस्ती को कभी सपोर्ट करेंगे तो मैं आपका विरोध करूँगा. फिर मुझे मत कहना कि मैं बहुत विद्वान बनाने की कोशिश कर रहा हूँ. कृपया इसे भी पढ़िए, उतनी अच्छी रचना नहीं है, बहुत पहले लिखी थी. पर भाव आप ही का है. http://merisada.jagranjunction.com/2012/01/29/%E0%A4%90-%E0%A4%85%E0%A4%A6%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8B/

    pawansrivastava के द्वारा
    April 11, 2012

    अनिल साहब ! आपकी कविता पढ़ी ..काफी संबलता मिली यह देख कर कि मेरे जैसे ख्यालात आपके भी हैं .और मेरी सोंच सावन की कोई धुप नहीं है कि अभी दीखेगी और अभी गायब हो जाएगी …

follyofawiseman के द्वारा
April 11, 2012

मुझे चार बातें कहनी है, पर तीन तो मैं कहूँगा, चौथे के बाबत चुप रह जाऊँगा……… पहली बात मैं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़  साहब की जुबान मे कहना चाहूँगा…… “ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू लेकर चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तरों की आख़री मंज़िल कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज् का साहिल कहीं तो जा के रुकेगा सफ़िना-ए-ग़म-ए-दिल जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों से चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से पुकरती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी थकन सुना है हो भी चुका है फ़िरक़-ए-ज़ुल्मत-ए-नूर सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ए-हराम जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई अभी चिराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई” दूसरी बात मैं शॉ की जुबान मे कहूँगा……. “Revolutions have never lightened the burden of tyranny. They have only shifted it to another shoulder.” तीसरी बात जो मुझे कहनी है और मैं अपनी ही जुबान मे कहूँगा……. ‘problem as such is never a problem,’ जीवन की समस्याएँ दो प्रकार की है, एक समाजी और दूसरा व्यक्तिगत, मेरे अनुभव से सामाजिक समस्या को सीधे समाप्त नहीं किया जा सकता है, और उनसे लड़ के तो कदापि नहीं, और अगर लड़ते है तो फिर शॉ की बात सच सवित होती है, ”Revolutions have never lightened the burden of tyranny. They have only shifted it to another shoulder.” एक समस्या तो समाप्त कर लेते हैं हम, पर उस एक को समाप्त करते करते हैं हज़ार नई समस्याएँ पैदा कर लेते हैं……हाँ, ये बात है, जब एक जेल से दूसरे मे जा रहें होते हैं, तो एक जेल से दुसरे मे जाने मे जो समय लगता है, उस दौरान कुछ देर के लिए हम अच्छा फील कर लेते है,,,,पर अगर हमे थोड़ी समझ हो तो वो भी संभव नहीं है………..!  फतेह पुर सिकरी मे जीसस का बहुत ही प्यारा वचन खुदा हैं मुख्य द्वार पर , ”ये दुनियाँ पूल की भाँति है, यहाँ अपना घर मत बनाओ, बस इस पे से हो कर गुजर जाओ” चौथी बात जो मैं कहना चाहता हूँ……. …………………………………………………….. ……………………………………………………..!!!

    pawansrivastava के द्वारा
    April 11, 2012

    संदीप साहब आपसे ३ बातें कहना चाहूँगा -१हला -क्रांति का मतलब होता है परिवर्तन और मेरी कविता से यह स्पष्टतः विदित है कि मैं ज़िन्दगी के सुरमई तरतीबों को न बिगड़ने देने की बात कह रहा हूँ अर्थात मैं ज़िन्दगी में किसी तरह की क्रांति नहीं चाहता हूँ ….मज़हबी क्रांति तो खास तौर पे नहीं …. प्रकृति ने क्रांति की प्रयाप्त व्यवस्था कर रक्खी है …..इंसान तो क्रांति के नाम पर बस अपने स्वार्थ को साधता रहा है ..चाहे वह स्वार्थ सूक्ष्म रूप धारण कर मन के गहरे में छिपा हो ,पर स्वार्थ होता ज़रूर है ….निज अहम् को पोषित करने का स्वार्थ ,महानता का अभीष्ट लिए स्वार्थ ..अब इस बहुरूपिये स्वार्थ के बारे में क्या बताऊँ ….२सरि बात – आपसे अपनी इस शायरी के ज़रिये कहना चाहूँगा कि – यूं अल्फाजों के बंदिशों में महदूद न करो आफ़तब को : अंधेरा गहरा है,रौनके-हयात की सख्त ज़रूरत है. और ३सरि बात यह रही :- ……………………………………..:) :) :)

    sadhna के द्वारा
    April 13, 2012

    संदीप जी आपने ठीक कहा समस्याएं दो प्रकार की होती हैं व्यक्तिगत और सामाजिक…. मुझे लगता है अगर हर कोई अपनी व्यक्तिगत समस्या को सुलझा ले तो एक दिन सामाजिक समस्या अपने आप ही ख़तम हो जाएगी…… पवन जी चमनलाल जी से कहिये इतने भयंकर शब्द जल्दी समझ नहीं आते थोड़े हलके फुक्ले शब्द…….

pawansrivastava के द्वारा
April 11, 2012

साधना जी ! चमन लाल जी परम ज्ञानी पुरुष हैं …ठोकरें खा खा कर सीखते हैं …..संदीप जी के बड़े अजीज दोस्त हैं :)

    sadhna के द्वारा
    April 11, 2012

    अच्छा!!! संदीप जी की रचनाओं में उनका असर साफ़ झलकता है…. :) :) :)

    pawansrivastava के द्वारा
    April 11, 2012

    पूर्ण-रूपेण सहमत आपसे साधना जी !infact हमदोनो ज़ल्दी हीं युगलबंदी में एक ज़बरदस्त धमाका करने वाले हैं जिसे पढ़कर लोग ….फिलहाल राज को राज हीं रहने देते हैं

sadhna के द्वारा
April 11, 2012

I am surprised!!!! कहाँ से ऐसे शब्द मिलते हैं…. बहुत खूब… बिलकुल सही कहा आपने पवन जी बचपन में हर कोई कितना innocent होता था मुझे आज भी याद है राजीव गांधी की हत्या के बाद जब दंगा भड़का था तब हमसब रात रात भर जाग कर बिता देते थे कौन हिन्दू है कौन मुसलमान कोई फर्क नहीं पड़ता था और एक वक़्त तो ऐसा भी था जब मेरी माँ ने कितने ही मुसलमानों को हिन्दुओ से बचाया था उन्हें अपने घर में रख कर….कितना अच्छा था वो वक़्त…..

    pawansrivastava के द्वारा
    April 11, 2012

    साधना जी ! मेरी आवाज़ को बुलंद करने के लिए दिल से धन्यवाद आपका ….जहाँ तक विचारों की बात है तो मैं ये विचार चमनलाल से उधार लेता हूँ :) ) चमनलाल जी को तो आप जानती होंगी ?

    sadhna के द्वारा
    April 11, 2012

    चमनलाल जी का बहुत नाम सुना है जानने की इच्छुक हूँ की आखिर कौन हैं वो….

riteshsinghpatel के द्वारा
April 11, 2012

क्या बात क्या बात . हम आपके साथ है.

    pawansrivastava के द्वारा
    April 11, 2012

    रितेश साहब हौसला बढ़ा दिया आपने …शुक्रिया !

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 11, 2012

तू भूल गया कि किस परीपेक्ष्य में उठा था अस्त्र उनका, तू भूल गया कि बडा. हीं धर्म-निरपेक्ष था शस्त्र उनका, तू भूल गया कि उनके तीर से किसी फ़िरके का कोई फ़र्द नहीं बल्कि एक दानव मारा गया था ,……..पवन जी नमस्कार ..बिलकुल सही फरमाया है आपने अगर लोगो की समझ इतनी विस्तृत होती तो धर्म के नाम पर कोई दूंगा फसाद क्यूँ होता …अफ़सोस की भीड़ कोई समझ नहीं रखती है ..और फिकरेपरस्त इसका पूरा फायदा उठाते है…. कई तरीके से अपनी बात रखी है काबिले तारीफ है…… (अगर उर्दू के कठिन लफ्जो का मतलब नीचे डाल देंगे तो हम ज्यादा अच्छे से भाव को मह्सुश कर पाएंगे …जसे मुंज़मिंद:-,बजिंसहा)

    pawansrivastava के द्वारा
    April 11, 2012

    महिमा जी ….दिल से शुक्रिया ! अपने ऊपर लिखे रचनाओं के बारे में अपनी एक और कविता के माध्यम से यही कहना चाहूँगा कि – कितना अच्छा होता जो मेरे स्याही को किसी इंसां का लहू नहीं, बल्कि खुल्द,खुलूस,खैर और खुशी का खुशनूमा रंग मिलता; मैं लिखता फ़कत अफ़साने मेलो-मिल्लत के, कितना अच्छा होता जो मुझे तंज़ो-तल्खीयत का न कोई प्रसंग मिलता; MEANING:खुल्द-Paradise ; खुलूस-Sincerity ,Purity,Intimacy,Affinity. मुंज़मिंद:- जडवत होना ,बजिंसहा- साकार होना


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