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पागल मन बके दनादन

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pawansrivastava


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अंतहीन गिनती

Posted On: 17 Jan, 2013  
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के द्वारा: Ajay Kumar Dubey Ajay Kumar Dubey

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के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

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के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

श्रीमान rdx जी मैंने सोंचा की कूड़े को हीरे में कैसे तब्दील किया जाता है ,इसका नुख्सा मैं आपसे सीख लूं ..आपके ब्लॉग पे गया तो o पोस्ट देखकर बात समझ में आ गयी कि आप उनलोगों में से हैं जिनके पास वक़्त अफ़रात है और अक्ल कम ..जो खुद तो लिखते नहीं हाँ दूसरों के लिखे पर खूब नुक्ताचीनी करते हैं ... बहुत मुमकिन हैं कि आप किसी और नाम से इस JJ मंच पे सक्रिय हों और कुछ इस अंदाज वाले शख्स हों -'मैं हूँ बाबु कलम घसीटा ,थका हरा मारा पिटा' और हीन भावना से ग्रसित हों .....तभी तो क्षदम नाम से अपना गुबार निकलते रहते हैं .... ठीक आप जैसे कुछ पडोसी भी होते हैं ....उनके मद्दे-नज़र एक कूड़ा अर्ज़ करता हूँ ,गौर फरमाइयेगा : मेरा पडोसी अपने बेटों के बूरी लतों पे उनसे खफ़ा है और मुझसे दर खफ़ा है कि मैंने वो बूरी लतें क्युं न पाली आप को यह समझना चाहिए कि यह मंच केवल गुलज़ार और जावेद साहब जैसे मकबूल रचनाकारों के लिए नहीं हैं .....कुछ हमारे जैसे भी गए गुजरे लोग हैं जो अपने जज्बातों को शब्दरूपी आलंबन देते रहते हैं .....दोष मेरा हो सकता है पर उनका कतई नहीं जो हम जैसे लेखकों का हौसला आफजाई करते हैं ...बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करते हैं . अंत में अपने भावनाओं को बयाँ करता एक और कूड़ा आपकी खिदमत में वजा लाता हूँ : ना सही अर्श का आफ़ताब मैं एक टिमटिमाता जुगनू हीं सही : ज़र्रा जरा हीं सही पर कतरा-ए-ज़ुल्मत तो मैं भी मिटाता हूं

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

उपरोक्त अलग-अलग चार शेर लिखा हूँ ...किन्तु उनके बिच स्पेस देने पर भी स्पेस नहीं दिख रहा लग रहा है.................इन पर भी मोहब्बत का सर हो गया ......... रात ढल गयी मगर, कुछ बात अभी बाकी है, परवाना जल गया, मगर रख अभी बाकी है, कैसे भूल जाऊ उस हसीं चेहरे को ‘अलीन ‘ भर गया जख्म फिर भी दाग अभी बाकी है………………..! ----------------------------------------------------------------- जो कहता है, अलीन हार गया सबकुछ मोहब्बत में, बड़ा अजीब है वो शख्स, उसे कुछ दिखता ही नहीं. यहाँ मैं हरेक रात को घनघोर अँधेरा कैसे कह दू, लगता है उसे, अँधेरे के बाद उजाला दिखता नहीं. चलो मान लेता हूँ, हार गया सब कुछ मोहब्बत में, क्या किसी को भी इस हार में, एक जीत दिखता नहीं. तुम अंधों का शहर है या हमारी मोहब्बत अंधी कि देखते हो सबकुछ मगर तुम्हें कुछ दिखता नहीं. ---------------------------------------------------------------- सुबह होश संभाला, रुख किया जब उसके कुंचें की ओर ‘अलीन’ ताज्जुब था देखकर सूरज सर पर और अब तक बेहोश थे सभी. ------------------------------------------------------------------- अफ़सोस अब तक हारा नहीं कुछ भी मोहब्बत में, लाख कोशिश किया तुमने मुझे हराने को यहाँ, कैसे दूर करू तुम्हारी गलतफहमी को, जहाँ अभी हारने को गीता है बाकी, अभी कुरान है बाकी, अभी यह जहान है बाकी, अभी वह जहान है बाकी, अभी हम इंसान है बाकी, अभी भगवान है बाकी, यक़ीनन यह हार नहीं मिहब्बत में अपनी ‘अलीन’ अबतलक मैं हूँ बाकी, मेरा इमान है बाकी…………….

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

पवन सर, आप ने मोहब्बत के समुन्द्र में मुझे इतने गोते लगा दिए कि मेरी तो सांस ही उखड़ने लगी......................! अरे हम तो पहिले से ही मर रहे हैं..........बीच-बीच में मुझे मारने कि तैयारी क्यों करते हैं आप लोग........... रात ढल गयी मगर, कुछ बात अभी बाकी है, परवाना जल गया, मगर रख अभी बाकी है, कैसे भूल जाऊ उस हसीं चेहरे को 'अलीन ' भर गया जख्म फिर भी दाग अभी बाकी है....................! सुबह होश संभाला, रुख किया जब उसके कुंचें की ओर 'अलीन' ताज्जुब था देखकर सूरज सर पर और अब तक बेहोश थे सभी. जो कहता है, अलीन हार गया सबकुछ मोहब्बत में, बड़ा अजीब है वो शख्स, उसे कुछ दिखता ही नहीं. यहाँ मैं हरेक रात को घनघोर अँधेरा कैसे कह दू, लगता है उसे, अँधेरे के बाद उजाला दिखता नहीं. चलो मान लेता हूँ, हार गया सब कुछ मोहब्बत में, क्या किसी को भी इस हार में, एक जीत दिखता नहीं. तुम अंधों का शहर है या हमारी मोहब्बत अंधी कि देखते हो सबकुछ मगर तुम्हें कुछ दिखता नहीं. अफ़सोस अब तक हारा नहीं कुछ भी मोहब्बत में, लाख कोशिश किया तुमने मुझे हराने को यहाँ, कैसे दूर करू तुम्हारी गलतफहमी को, जहाँ अभी हारने को गीता है बाकी, अभी कुरान है बाकी, अभी यह जहान है बाकी, अभी वह जहान है बाकी, अभी हम इंसान है बाकी, अभी भगवान है बाकी, यक़ीनन यह हार नहीं मिहब्बत में अपनी 'अलीन' अबतलक मैं हूँ बाकी, मेरा इमान है बाकी................ जल्दी-जल्दी में शेर लिखने में बहत जगह पक्तियां ढीली पड़ गयी हैं....जिसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ........दरअसल आपके उपरोक्त शेरोन को पढ़ने के बाद मेरी कलम रुकी ही नहीं.................!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

महिमा जी ..तारीफ के लिए शुक्रिया ...वैसे आपकी जानकारी के लिए बताना चाहूँगा कि मैं पजामा पहन के कभी पतंग नहीं उडाता था .....क्यूंकि पजामे के नारे का पतंग के डोर से उलझने का खतरा होता था ....:) :) ...और रही बात वैवाहिक जीवन के लुत्फ़ उठाने की तो बेशक मैं लुत्फ़ उठा रहा हूँ पर साथ हीं एक सच्चाई यह भी है की ज़िन्दगी एक chequered शर्ट की तरह होती हैं जिसमे सफ़ेद और काले रंग की धारियां होती हैं .....सफ़ेद सुख की और काली ग़म की ....मेरी मौजूदा बीबी सफ़ेद धारी है -सुख देने वाली और पहला प्यार -काली धारी जो जब तब कसक देती रहती है ....और फिर मुहब्बत तो वो जाविदाँ अहसास है ,जितनो से हो जाये कम है(MALE LOOKOUT ) :) ....क्यूँ सही कहा न मैंने ?

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

"तुम कहां हो कि तुम्हें भेजी उम्मीदों की बैरन चिट्ठी मेरी, हर बार मेरे हीं पते पे लौट जाती है: तुम कहां हो कि तुम्हें भेजा मेरे मुहब्ब्त का हर पयाम, तन्हां वादियों में पूकारे आवाज के मानिंद बार-बार मेरे हीं दयार में गुंजता है: क्या कभी मेरे पुरसोज़ सांसों का कोई लम्स , कोई छूअन तुम्हें महसूस नहीं हुआ : क्या कभी मेरे आंखों से छलकते किसी अश्क के कतरे ने तुमको नहीं छुआ : क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं तुम्हें मुसलसल पूकार रहा हूँ : क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि तुम्हारे इंतज़ार में मैं अपनी सांसें हार रहा हूं: इससे पहले कि मेरे मुख्त्सर ज़िंदगी का सूरज ढल जाए कहीं : आ जाओ कि विरहन की आग में न हम जल जाएं कहीं:" क्या है ये दादा..... किसने कहा था ये सब लिखने को.... बड़ी उलझन हो रही है हमे ये सारा पढ़कर.... कितने बार पढ़े..... अच्छा हम जा रहे हैं अब......

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है पेज 40-41 में .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

कल्पनाओं का पंख लगा तुम्हारा अज्यमितिय उड़ान ब्योम के विपुलताओं में छलांगा था प़र चूक गए तुम अपने गणना में जब यथार्थ के पटल प़र तुम पटके गए प्रयोसं के चंद फर्लांग मात्र चलने प़र.... पवन जी , नमस्कार .. क्या दृश्य उपस्थित किया है आपने जनाब ... अंतिम में इन उपरोक्त पंक्तियों में गजब लिख गए .... कैसी कैसी जिन्दगिया है सच में और कैसे दरिन्दे जो हमारे बिच में .. घिनौना कृत्य कररहे है महज चंद पैसो के लिए .. मृत्यु देवी भी अट्टहास करती होगी जब भ्रूण कुत्तो के ग्रास बनते होंगे .. बस आहो के सिवाए हम कुछ दे नहीं सकते ये मौत तू अट्टहास कर ले मानवता तो बस मजाक जैसी कोई चीज है .. हमारी विवशता तो बस मूक रुदन की तस्वीर है

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी,  'अपनी डफली अपना राग' ...........मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ   रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है.......... अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा......अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा.......आत्मवान व्यक्ति respond करता है.....तीन दिन बाद react नहीं........और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो....मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको......चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का..... इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है.....आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है..... इस सब के आलवे......न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है........स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है......हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है.......और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो...... "इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…" जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है......ये किसी और लोक की बात नहीं है........... आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें....की बिना रावण के राम का होना असंभव है.......आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं......ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए.......जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा.......... " इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ" क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा.....अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल..........और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है...........तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है...........क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा........मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है.........ये भिखमंगापन त्यागिए.........!  और अंत मे यही कहूँगा....कि , 'जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा..... और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है............मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा........." (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो.......मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है.........) एक और बात ज़रा मुझे बताइए....जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी......? व्यक्ति का अस्तित्व होता है...समाज का नहीं.....मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे......????

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

मैंने अपने इस आलेख में, कहीं भी नारी जाति को लेकर टिप्पड़ी नहीं की है यदि फिर भी इस पर स्त्री जाति द्वारा इसके विरुद्ध आवाज उठता है तो उनके भवनों का सम्मान करता हूँ और साथ में नारि जाति का भी. अतः इस आलेख के साथ अपना माफीनामा संलगन कर रहा हूँ और पूरी नारी-जाति से इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ. और यदि कोई सजा हो तो वो भी मंजूर परन्तु दूसरों की तरह पोस्ट को हटाकर अपने गुनाहों पर परदा नहीं डाल सकता और ना ही पोस्ट डिलेट करने के बाद , यह कह सकता हूँ कि मुझे किसी बात का पछतावा नहीं है परन्तु दूसरों के कहने पर यह डिलेट कर रहा हूँ. क्योंकि ऐसी महानता मैं नहीं दिखा सकता जिससे गुनाह भी करूँ और खुद को सही साबित करके लोगो की तालिया बिटोरू. साथ ही यह विश्वास दिलाता हूँ कि फिर कभी नारी जाति पर मेरी कोई ऐसी टिप्पड़ी नहीं होगी. हरेक गुनाह के साथ गुनाहगार का माफ़ीनामा होना चाहिए या फिर उसके गुनाहों की एक सजा जो इस बात का उसे याद कराये की उसने गुनाह किया है और साथ ही लोगो को भी पता चले कि वह गुनाह क्या है? अतः मैं अपने गुनाहों पर पर्दा डालकर, इस आलेख को डिलेट नहीं कर सकता. यदि आप सभी के मान-सम्मान और मर्यादा को मुझसे ठेस पहुँच रहा है तो मैं पहिले बोल चूका हूँ कि इस मंच को छोड़कर जाने के लिए तैयार हूँ क्योंकि यदि किसी का मान-सम्मान और मर्यादा खुले आसमान में लटका है तो हवा ( अनिल ) के प्रवाह से उसका हिलना स्वाभाविक सी बात है और वह हमेशा हिलाता ही रहेगा मैं रहूँ या ना रहूँ क्योंकि और भी करक है इस दुनिया में उसे हिलाने के लिए. नोट- कृपया जिस मान-सम्मान और मर्यादा की बात निचे की पंक्तियों में रखा हूँ नारी जाति अपने ऊपर न ले. वह इस मंच के मान-सम्मान और मर्यादा के ऊपर सवाल उठाया हूँ.........!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

संदीप जी बहुत सहज  ढ़ंग से आपने महाभारत  को समर्थन कर  दिया क्या आपको महाभारत  के दुष्परिणाम का पता है, भारत के सारे विद्वान मृत्यु को प्राप्त हुये।  कुटिल मूर्ख  विद्वान  बन गये, इन्होंने अपनी अकर्मता के वशीभूत  होकर ऋषियों के नाम  से पुराणों आदि का सृजन  किया, धर्म  को  अधर्म  का रूप दे दिया। अपने कुनबे को देवता घोषित  कर  दिया। कर्माधारित वर्णाव्यवस्था को जन्माधारित  जाति् प्रथा का रूप दे दिया। कालान्तर में अपने  पुरखों की मूर्तियाँ बनाकर ईश्वर का अपमान करते हुये उनकी पूजा आरंभ  कर दी। इस  तरह  हिन्दु धर्म  का पतन हो गया। जिसका दुष्परिणाम  हमारी गुलामी रहा। मैं कायरता का समर्थन नहीं करता। किन्तु अनावश्यक  हिंसा का भी समर्थन नहीं कर सकता। हिंसा के लिये हिंसा न हो, अपितु शांति के लिये हिंसा हो। महाभारत की हिंसा एक  जमीन के टुकड़े के लिये हुई थी। वह  विचारों की ल़ड़ाई नहीं थी। दो  परिवारों के बीच  की लड़ाई को लोग  धर्म  की लड़ाई की संज्ञा दे देते हैं यह मेरे समझ   के परे है। महाभारत  की लडाई मेरे समझ  के परे है। मैं भी कृष्ण  को महान मानता हूँ किन्तु उनके कुछ  कृत्य मानवीय  दृष्टि से क्षम्य  नही ं हैं। हो सकता है कि मेरे विचारों से कोई सहमत न हो किन्तु मैं तार्किक  कारणों से अपने  विचारों पर अटल  हूँ।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

"कोई हालत नहीं ये हालत है ये तो आशोब्नाक सूरत है अंजूमन में ये मेरी खामोशी बर्दबारी नहीं है वहशत है तुझसे ये गाह गाह का शिकवा जब तलक है बस-गनीमत है हमने देखा तो हमने ये देखा जो नहीं है वो खूबसूरत है गर्म-जोशी और इस कदर क्या बात क्या तुम्हे मुझसे कुछ शिकायत है........" ..... जो हुई ही नहीं उसको बंद कैसे करें............जो द्वेष है ही नहीं उसके दलदल से बाहर कैसे निकले.......लड़ाई हुई ही नहीं और आप बंद करने की बात कह रहें है.......अगर लड़ाई हुई होती तो अपने आप ही बंद भी हो जाती......ये लड़ाई की ख़ासियत है...... इस देश में लड़ाई बस एक बार हुई थी....वो हुई थी 'महाभारत'.....महाभार के बाद जितनी भी विचार धारा बनी भारत में वो सब की सब लड़ाई विरोधी थी.....और जिसका परिणाम यह हुआ की भारत की आत्मा मर गई....यह देश नपुंसकों का देश हो गया.....और इसी कारण से पिछले 2700 वर्षों से गुलाम है.......कृष्ण के बाद ऐसा कोई भी व्यक्ति पैदा नहीं हुआ जो लड़ाई का समर्थन करता हो......महवीर से लेकर महत्मा गांधी तक सब ने लोगों को कायरता ही सिखाया है........हमे फिर से लड़ना सीखना होगा.....लड़ाई सृजन की प्रक्रिया की पहली शर्त है....... इसका ये मतलब नहीं है की मैं शांति का विरोधी हूँ.....नहीं मैं शांति का विरोधी नहीं.......मैं भी चाहता हूँ कि शांति हो पर मैं थोथी शांति के विरोध मे हूँ......ऐसी भी क्या शांति जिसे भंग की जा सकती हो.....ऐसी शांति कोई शांति हुई जिसमे सब संयम साध कर ज्वालामुखी पर बैठे हों.......नहीं इस शांति का कोई मोल नहीं है........ इस प्रकार की शांति मरघट की शांति है.......ये दौ-कौड़ी की शांति है......इसीलिए हे कृष्ण मैं आपकी शांति-प्रस्ताव स्वीकार नहीं करता हूँ......आप आग मे पानी नहीं घी डालिए और एक बार हो जाने दीजिए शब्दों की घमासान लड़ाई........निकल जाने दीजिए अंदर के शैतान को.........सब को नंगा नाच लेने दीजिए.......सब का मन हल्का हो जाएगा......उस हल्के और नीरवता लिए मन से स्वतः सुगंध और प्रेम की झड़ना फूटेगी इसके लिए हमे प्रयास करने की कोई जरूरत नहीं है......लेकिन पहले नफरत को पूरा पूरा निकाल जाने दीजिए........मत लोगों को दमन सिखाइए........

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

पवन श्रीवास्तव जी , नमस्कार ! आपकी लिंक मुझे मेल पर मिली , धन्यवाद ! हालाँकि मैं ना तो ज्यादा जानता हूँ और ना ही जानना चाहता हूँ की क्या हुआ और कैसे हुआ ! लेकिन आपने यहाँ से जाने की बात करी है ! ये आपका फैसला है , कोई कुछ नहीं कर सकता ! आप यहाँ नहीं थे , तब भी ये मंच चल रहा था , अब भी चलता रहेगा ! एक जाता है , दूसरा आ जाता है ! मैं भी चला जाऊं , क्या फर्क पड़ता है ? हालाँकि मैं कभी व्यक्तिगत मामलों में नहीं पड़ता , न ही पड़ना चाहता हूँ ! लेकिन आज मजबूर होकर लिखना पड़ रहा है ! आप किस उद्देश्य से इस मंच पर आये थे ? केवल लेखन करने के लिए , अच्छा लिखने के लिए , सही कह रहा हूँ ना ? आपने लेखन किया ? आपकी २० पोस्ट हैं , लेकिन ज्यादातर व्यक्तिगत हैं ! बीच बीच में आपने इतनी बढ़िया कविताओं का प्रयोग किया है की तारीफ करने का मन करता है ! शुरू में आपने बहुत उत्कृष्ट लेखन किया फिर ये व्यक्तिगत लेखन क्यों ? आपकी प्रतिभा , आपकी कविताओं से पता चलती है तो फिर सार्थक लेखन क्यों नहीं ? हम इस मंच पर आपस में लड़ने आये हैं ? एक दूसरे की खिचाई करने आये हैं ? एक दूसरे को नीचा दिखने आये हैं ? एक दूसरे को गाली देने आये हैं ? नहीं न ! तो फिर सार्थक लेखन की जगह ये व्यक्तिगत बातें क्यों ? रणक्षेत्र में रहकर ही अपनी बात करो और सार्थक लेखन करो मित्र ! बाकी आपका फैसला है , आप जो चाहें कर सकते हैं ! संभव है , आप गुस्सा हों , लेकिन मैं प्रतिउत्तर नहीं दूंगा !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

पवन जी नमस्कार , कल ही पढ़ लिया था आपको बहुत मन व्याकुल हो रहा है और दुखी भी .. कुछ भी समझ में नहीं आ रहा के क्या हो गया और क्यों हो गया .. बस इतना मन कह रहा है कैसे सब को रोक लूँ आप न जाए... क्या करूँ ... मैं बहुत जल्दी अवसाद ग्रसित हो जाती हूँ .. फिर कुछ भी नहीं कर पाती ... बहुत रोना आ रहा है . आपने जो निर्णय लिया है वो भावुकता और परिस्थितियों से घबडा के मैदान छोड़ने की बात जैसी है कुछ ... अगर आप व्यथित है कुछ दिन न लिख न किसी को पढ़े .. जब फिर से मन संतुलित हो जाए तब लिखे ..अगर सचमुच में साहित्य से प्रेम है तो अनवरत लिखते रहे और विपरीत विचारों के लोगो के कटु बातो में आकर यंहा लिखना बंद करना उचित नहीं है .... आप चाहे जितने भी दुखी हो आज .. मैं भी दुखी हो मेरा भी कल मन में आया छोड़ दूँ ..पर नहीं कुछ दिन नहीं लिखूंगी ... ... आपके अनमोल रचनावो के पढने का लोभ नहीं छोड़ पयुंगी ..इस लिए अनुरोर्ध कर रही हूँ .. बने रहे ..... एक बात और यंहा कितने कवी और लेखक है जो बहुत अच्छा लिख रहे है ... जैसे आतिस जी , राजकुमार जी .. सुभाष जी ..संजय जी , जयप्रकाश जी , और न जाने कितने लोग आतिस जी को तो कोई विचार भी नहीं (कमेंट्स ) भी पोस्ट नहीं करता ... बाकियों ने धैर्य रखा और लिखते रहे अब जा के उन्हें ५ ६ कमेंट्स मिलते है ... तो क्या वो लोगो से उलझते है ... नहीं वे निरंतर लिख रहे है ..... साहित्य धैर्य और निरन्तरता मांगती है ना की आपका एक ब्लॉग लोगो को पसंद नहीं आया तो आप लोगो से उलझ पड़े और बहस करते जा रहे है करते जा रहे है ..... इस से किसी को कुछ नहीं हासिल होता है आप अपनी बात रखने है तो अन्य नए विषय को लाये न की चीजो को खचते रहे .. ये मैं संदीप जी को कह रही हूँ .... और जब लोग आप के विरुद्ध आग उगलने लगे तो मंच छोड़ कर चल दे ... ये कही से बुद्धिमानी नहीं है आप लोगो की मानसिकता को वाकई बदलना चाहते है तो कुछ और अच्छा लिखे न की आप उलझते रहे ...... पवन जी आप सचमुच साहित्य से प्रेम करते है तो मंच न छोड़ने ..... रही साधना जी की बात मैंने देखा वो बार -२ संदीप जी को कहती है जिनको आप मित्र समझते है वो आपसे मीठी बात कर फिर आपके दुस्मानो के ब्लॉग पे जाकर जाकर आप के विरुद्ध लिखते है ... क्या है ये सब ,...... इतनी कटुता किस लिए ... .... क्यूँ आप ऐसी बात कर रही है ... कितना आपने अभी तक यंहा लिखा है ... आप को संदीप जी का लेखन अच्छा लगा .... ठीक बहुत बढ़िया ... पर इतना कटु होने की क्या आवश्यकता है ... अगर आप सिर्फ संदीप जी के लेखन से ही प्रतिबधता रखना चाहती है तो रहिये न पर सबको को अपने जैसा ही क्यों देखना चाहती है .................. यंहा किसी का भी रचना कभी भी भी किसी को अच्छा लग सकता और नहीं भी ....इसके लिए इतनी कटुता रखना ..... उचित नहीं .... कौन क्या कर रहा है .... या कह रहा है ...... उससे ऊपर उठकर ... निरंतर लेखन करना ही ....ध्येय होना चाहिए ..... पवन जी मुझे आपके निर्णय से दुःख और रोष दोनों हो रहा है ...... बाकी आप समझदार है .......

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

मित्र , आप दोनों मित्रों को में पसंद करता हूँ , संभवतः आप मेरी नजर में अलग और कमल के प्रतिभा के धनि है , पर आप अपना समय बेवजह वाकयुद्ध में बर्बाद कर रहे है , देखीय मित्र ना आप बदले अब तक ना और लोग , पर इक काम हुआ समय बर्बाद , सायद उस समय में आप अच्चा लिख लेते , सबको अपना पक्ष रखने का मौका दे , जब आप अपनी बात इतनी पुरजोर तरीके से रखते है , तो उनकी बात भी सहने का साहस रखें , आपने इस शोर शराबे में कभी ध्यान किया है की किसी बंधू ने आप लोगो की कलम शक्ति की आलोचना नहीं की , आओ मित्र इक जुट होकर चले , अपने तेवर मत बदलना आप दोनों इसी चीज का में फेन हूँ , पर हां इक विनम्र प्राथना है इस मुर्ख की हो सके तो भाषा बदल ले , आलोचना करे , खुल के करे , क्यूंकि इस मंच पर बेमतलब का मीठा बहुत है , मेरे किसी भी शब्द से आप लोगो को ठेश पहुंची तो क्षमा याचना , आपका मित्र चन्दन

के द्वारा: चन्दन राय चन्दन राय

स्वस्थ और सत्य विचार अकेलेपन में पनपता है …तब पनपता है जब लोग बगैर किसी से प्रीत या वैर रक्खे ,बगैर किसी पूर्वाग्रह के आत्म-मनन करते हैं ….किसी के लिखे शब्दों का बाह्य अवलोकन नहीं करते बल्कि उसकी गहराई में उतरते हैं ….तब जो विचार पनपता है ,उसमे शुद्धता होती है ,स्थायित्व होता है पवन जी नमस्कार ..आपका लेख    पढा ,आपके मन की व्यथा कहू तो ज्यादा उचित होगा ! बहुत कुछ दिल में आया लिखने को पर कुछ लिखना उचित नहीं लग रहा ! जब हम किसी गली से गुजरते है तो वहा कुछ इंसान मिलते है ,कुछ जानवर भी मिलते है !कुछ शांत रहते है ,कुछ गुर्राते है, कुछ भौकते है !पर जिनको मंजिल तक जाना है वो उन सबका सामना करते हुए रास्ता पार कर जाते है ! वो पागल है कि उसकी ज़ुबां में तल्खियत है सच्चाई की , तंज़ बहुत है; वो अहमक है जो नहीं जानता कि इस दुनियां में सच्चों से लोगों को रंज़ बहुत है; "पर राहिला बनने से पहले टूट गया …चंद लोगों कि बेवकूफियों कि वज़ह से ….फोल्ली जी और कलम वाली बाई चले गए शायद हमेशा के लिए ….आप लोगों की दुआ से मेरा एक फिल्म प्रोजेक्ट भी जल्दी शुरू हो रहा है ..व्यस्तता के आलम में अब कभी कभार हीं आ पाउँगा , अपने दोस्तों कि खैर खबर लेने" सच कहू आपकी ये पंक्तिया पढकर कुछ दिल में टूट सा गया

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

आदरणीय पवन जी, आप एक मूर्ती भंजक का काम कर रहे हैं, सच मैं ही हमारी कोन्दोतिओनिन्ग की जाती है बचपन से.और तभी हमारी सामाजिक संरचना का ताना बना बुना जाता है, सिर्फ प्यार ही क्यों हम कैसे उठे बैठे ,किस अवस्था में कैसे आचरण करें या करना चाहिए ये सिखाया जाता है .पर तभी हम इंसान कहलाते हैं.सिर्फ जंगली जानवर ही नैसर्गिक जीवन जी पाते हैं नहीं तो हम अपने पालतू जानवरों और पौधों को भी कोंडिशन करते हैं .और जहाँ जानवर समूहों में रहते हैं वहां भी उनको बचपन में तहजीब सिखाई जाती है.अगर ऐसा न हो तो अराजकता अवश्यम्भावी है.हाँ माँ बाप भी इंसान ही होते हैं परन्तु अपने वंशजों से प्रेम एक नैसर्गिक भावना है. ज्योत्स्ना.

के द्वारा: jyotsnasingh jyotsnasingh

पवन जी नमस्कार / में काफी दिनों से आप की पोस्ट पर आ रहा हूँ पर आज में इतनी लम्बी पोस्ट देख घबरा गया / इसमें गद्य , पद्य सभी हें / आपने बहुत मेहनत की हें पर रचना लम्बी होने के कारण पाठक उसे उतना समय नहीं दे पाता/ और आप की काफी मेहनत का पूरा फल नहीं मिल पाता / आप से मेरा व्यकिगत अनुरोध हें कि अब तक विषय की मांग न हो तब तक यदि छोटी पोस्ट ही रखें / आप लम्बी पोस्ट को छोटा छोटा करके अलग अलग शीर्षक से पोस्ट कर वाह वाही लुट सकते हें / जिसे की ये रचना काफी लम्बी हें अतः इसे तीन चार बार पढने पर भी कोई सटीक पर्तिकिर्या लिखना मेरे लिए संभव नहीं हो पा रहा हें / आशा हें आप कटु पर सत्य वचन के लिए माफ़ करेंगें /

के द्वारा: satish3840 satish3840

पवन जी नमस्कार, पहली बार मौका मिला है आपकी रचना पढने का .... पहले तो ब्लॉग का नाम लैपटॉप वाला सूफी मुझे खिंच लाया की देखे सूफी जी क्या कह रहे हैं तो ब्लॉग पर आने के बाद पता चला की बिना पढ़े जाने का तो सवाल ही नहीं है .... क्या हिप्नोटैज़ किया आपने अपनी बातो से .... अछि रचना है ... हम इंसानों की एक सबसे बड़ी कमी यही होती है की हम ज्ञान देना जानते हैं और लेना भी जानते हैं पर उसका प्रयोग करना नहीं .. यानि अच्छा अच्छा कहेंगे लेकिन क्या अच्छा अच्छा कर पाते हैं ....... वो शोलगी भरी कैफ़ियत और सीरी ज़ुबान वाली शख्सीयत: वो लुभावने ज़िल्द में छिपी घटिया दास्तान वाली शख्सीयत: वो काली सोंच और सफ़ेद गिरेबान वाली शख्सीयत: वो बेचकर गैरत और ईमान ,हुए महान वाली शख्सीयत: अगर ऐसे बनती है शख्सीयत तो हम गुमनाम भले युहीं लिखते रहें हमेशा.....

के द्वारा: mparveen mparveen

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

पवन जी नमस्कार , मैं बहुत हर्षित हूँ ... आपमें अपनी जिम्मेवारी को समझा और आपकी कविता के बाद से शुरू हुए विवाद (क्योंकि समझ ने वाले कम थे गरियाने वाले ज्यादा इस लिए :) ) को एक सार्थक मोड़ पे लाकर छोड़ा है / बहुत जरुरी था आपका विस्तार पूर्वक बातो को रखना ... मैंने अभी अभी संदीप जी के ब्लॉग में लिख के आ रही हूँ की सभी बुध (ज्ञान ) की तरह होते (पूर्वाग्रह को छोड़ नयी सोच को सचने और जानने के उत्सुक ) या फिर रजनीश की तरह तार्किक मीमांशा के धनी तो दुनिया ऐशी नहीं होती कब की बदल गयी होती .. पर विचारों की लड़ाई है ..और मानसिकता को भी बदलने की तो थोडा धर्य तो रखना ही होगा .. क्योंकि हमेशा से परिवर्तन समय और सयम दोनों मांगती है ....... अतः हमारा कर्तव्य है की .आहत होने के बाबजूद भी अपने विचारों को सामने रखते रखे .... एक दिन सभी मानसिक अवरोध और अपने जिद्दी विचारो से हट कर हर पहलु को खुल कर देखने और कहने की हिम्मत में शामिल हो जायेंगे ....... आमीन आपकी कविता तो बस .. कुछ कहने नहीं देती है .. निशब्द करती है ........... बहुत -२ बधाई आपको

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

बड़े भाई पवन जी, नमस्कार, मुरीद कर लिया भाई आपने हमें, आपने तो सारा सच ही कह दिया, इसे पड़ने के बाद तो किसी को कुछ कहने के लायक ही नहीं छोड़ा आपने...पड़कर बहुत अच्छा लगा, इस लेख के लिए मेरी और से हार्दिक बधाई... बस इतना निवेदन करूँगा की अपने इस छोटे भाई पर अपने आशीष की वर्षा करते रहें.....! क्यूंकि आज के ज़माने में समंदर के तल से सुई ढूँढा जा सकता है पर विवेकशील आदमी को ढूँढना नामुमकिन है …..छिछले ज्ञान का छदम आवरण ओढ़े ज्ञानी तो कई मिल जायेंगे पर वो ज्ञानी विरले मिलेंगे जिनके ज्ञान में सच का आत्म-स्वीकृति हो ,जिनके ज्ञान उस हीरे जैसा हो जो सच के खराद पे चढ़ के चमकता है ..जो सच को कहने के लिए थोथे दलील का सहारा नहीं लेता … जो निज मन को टटोलता है फिर कहता है ,वही जो उसने अवचेतना के सूक्ष्म स्तर पे महसूस किया है ….मन एक अथाह समंदर है और ज्ञान का हीरा मन के अवतल पे रक्खा है….छिछले गोते से कम नहीं चलेगा …गहरे में जाना होगा ….अवचेतना के गहरे स्तर को ज्ञापित करना हीं तो ज्ञान है ......!

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

आदरणीय पवन जी नमस्कार, चलो मैं हतभाग्य हूँ या मेरे करम में खुदा का मेहर नसीब नहीं पर एक अबोध बच्चा जिसके हाथों की लकीर भी ठीक से दृष्टिगोचर नहीं होती…. उसे उसके बाप के द्वारा मार दिया जाना खुदा का कौन सा करम है ? .. उस दिन हर किसी के सांसों में मंत्रों का गुंजन था, प्रार्थनायें थी,दूआयें थीं और त्राही-माम का क्रंदण था पर जैसे हीं प्रलय का खतरा टल गया, हर किसी के ह्रिदय से इश्वर जाने कहां निकल गया . बहुत सुन्दर पंक्तियाँ. सर्व बोधी इश्वर को भी शायद पढ़कर उसका कर्तव्य बोध हो गया होगा. हिंदी कविताओं में इतना अधिक उर्दू का मिश्रण क्वचित ही होता है किन्तु आपने कविता के प्रवाह को बरकरार रखते हुए जो मिश्रण किया है वह काबिले तारीफ़ है. इसीलिए शायद कहा जाता है की कविता की अपनी ही भाषा होती है. बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

पवन जी, मुझे लगता है आप मेरी टिप्पणी से बहुत आहत हुये हैं इसके लिये में क्षमा प्रार्थी हूं. आपने इसे जिस नजर से लिया मेरा वो अभिप्राय कतई नहीं था. मेरा मनत्व्य केवल इतना था कि इस कविता को थोडा छोटा और संयत किया जा सकता था जो किसी एक विषय विशेष के इर्द गिर्द रहती और एक सुन्दर सा शीर्षक भी होता. हिन्दी और उर्दू का मेल भी अच्छा लगता है परन्तु यदि हिन्दी के कलिष्ट शब्दों का प्रयोग न कर हल्के शब्दों का प्रयोग किया जाये. जहां तक भाषा की बात है हिन्दी और उर्दू पर मेरा समान रूप से अधिकार है. मेरा यह मानना है कि लेखक के लिये आलोचक प्रशंसकों से अधिक उपयोगी होते हैं. जब हम कोई रचना लिखते हैं तो उसमें सिर्फ़ हमारे बिचार का पक्ष होता है जवकि पाठक आलोचना व टिप्पणी से उस को बहुआयामी बना देते हैं एक बार फ़िर से क्षमा प्रार्थी हूं यदि आपको मेरा नजरिया ठीक न लगे.

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

चन्दन भाई आपकी सलाह सर आँखों पे ....आपने सच कहा भावें बिखरी हुई हैं पर अगर आप इस कविता में निहित मेरी मनोदशा देखें तो आप पाएंगे की मैं सचमुच इश्वर के अस्तित्व को लेकर विहंगम की स्थिति में हूँ ...मेरा एक अंतरभाव कहता है की इश्वर हैं ...एक अंतरभाव कहता है की इश्वर नहीं ...फिर ऐसा भी लगता है की इश्वर है पर उसकी कृपा नहीं ....इश्वर विनय की रागिनी ,सृजन का तान बजाना भूल गया है ...उसे अब बस संहार का सुदर्शन चलाना ही आता है ....वह भी बेकसों पर .मज़लूमो पर ...आतताइयों पर अब उसका कोई जोर नहीं चलता ....अब इतने सारे परस्पर विरोधी भावों को ढ़ोती कविता में एकात्मकता कहाँ से रहेगी ....मेरे ख्याल से अगर यह कविता समरूप होती तो मेरे अभ्यंतर अंतर्द्वंद को ,मेरे बहकते ख्यालों,मेरे मन के उहपोह को ढ़ो नहीं पाती .....एक और चीज गौर कीजियेगा ..मैंने अलग अलग कविताओं के ज़रिये अपने अलग अलग भावों को व्यक्त किया है :)

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

मुझे मालूम है अनर-गलर बातें करके आप मेरी देहरी में झाँकने ज़रूर आयेंगे ...यह देखने कि जो थूक अपने आसमान में ऊँचा फेंका है ..वह कितना ऊँचा गया है ....तो मेरी मानिये दूर हट जाइये कहीं देखने के चक्कर में थूक आप हीं पे न आ गिरे ...आसमान तक पहुचने से तो यह रहा 'यह मेरी व्यक्तिगत राय है. इसे अन्यथा न लें.' अन्यथा तो लूँगा मोहिंदर साहब क्यूंकि आपकी कथनी करनी में अंतर है ....एक तरफ आप कहते हैं कि मैंने पाठकों से पंगा ले लिया (जैसे कि आप सारे पाठकों के पसंद -नापसंद को जाने वाले अंतर्यामी हो गए....अजी साहब अपने ठीक ऊपर लिखे टिपण्णी को तो पढ़ लिया होता ) और दूसरी तरफ आप दावा करते हैं कि यह आपकी व्यक्तिगत राय है ...और जहाँ तक हिंदी उर्दू के घालमेल कि बात है तो यह कविता मैंने आपकी सुगमता के लिए नहीं लिखी है .....आपको लम्बी लिखी बातें याद नहीं रहती....तो आप अपने इस मूषक स्मृति के लिए किसी वैद्य-हकीम को दीखाइये ,मेरा मूड क्यूँ ख़राब कर रहे हैं ..... P.S-मैं इन्सान पहले हूँ और लेखक बाद में ... तर्क संगत आलोचना सह सकता हूँ ,कुतर्क नहीं ....लम्बी कवितायें लिखना ,हिंदी और उर्दू के शब्दों को साथ साथ संयोजित करना अगर इसे आप मेरे लेख कि त्रुटी कहेंगे तो मुझे यह आपकी ........ के सिवा कुछ नहीं लगेगा ...यह रिक्त स्थान .......मैंने इसलिए लिख छोड़ा है कि इसे आप और यहाँ आने वाले बाकि लोग अपनी सुगमता के हिसाब से भर सकें ....भगवान् के लिए अब आगे मुझे छेडिएगा मत ....वरना आप मेरा वक़्त और मेरी स्याही दोनों बर्बाद करेंगे ..Because I believe in paying in same coin .

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

जहाँ तक मुझे पता है.....मैं नहीं मानता की किसी माँ का बेटा कभी भी नालायक हो सकता है........ ये नामुमकिम है.....हाँ किसी नर्स का बेटा नालायक ज़रूर हो सकता है.......माँ होना परम घटना है......कभी कोई हजारो मे एक स्त्री माँ होने के गौरव को उपलब्ध हो पाती है......अगर माँ नालायक हो तो बेटा का नालयक होना तय....है....अगर किसी माँ ने सच मे निस्वार्थ भाव से अपने प्रेम किया हो तो उस बेटे का नालायक होना असंभव है.......मैं तो अब तक जितनी माताओं से मिला हूँ वो सब की सब मुझे व्यापारी दिखी......! प्रेम मे माँग संभव नहीं है..........और न ही प्रेम एहसान बर्दाश्त कर सकता है.......! प्रेम मे कैसा एहसान........प्रेम जिम्मेवारी नहीं.......अगर कोई बेटा अपनी माँ का ख़याल सिर्फ इसलिए रख रहा है की उसकी माँ ने उसके लिए बहुत कुछ किया था, और उन सब किए को याद कर माँ की सेवा कर्तव्य के तौर पर कर रहा है,,, मैं उस बेटे को जियादा लायक कहूँगा जो ऐसा कुछ भी नहीं करता......दिखावे की मुहब्बत से अच्छा सच्चा अप्रेम है.....कम से कम सच्चा तो है.... जो प्रेम देता है उसे मिलेगा है....और अगर कोई सिर्फ पाने के ख़याल से किसी से प्रेम करता है तो वो प्रेम दो कौड़ी का है और उसमे निराशा मिलना तय है.......इन माताओं को जरा भी निराश नहीं होना चाहिए अगर इन के बेटें इनको निराश कर रहें है.......व्यपार मे लाभ हानि चलता रहता है........... अगर कोई माँ अपने बच्चे से सच मे प्रेम करती है तो वो कभी त्याग नहीं करेगी.......प्रेम मे देना आनंद है त्याग नहीं......और जो माताएँ इस बात की गिनती रखती है कि क्या-क्या किया.....कितना दिया वो माँ नहीं नर्स है...... और नर्स का बेटा नालायक होगा ही...नीम के पेड़ मे आम नहीं लागतें है........!

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

भाई पवन जी सादर अभिवादन, मेरे पास आपकी कवितों के बारे में वो शब्द नहीं हैं, जिनकी मदद से प्रशंसा के दो शब्द कह सकूँ! अत्यंत ही मर्मस्पर्शी भावों को अपने अंतर में समेटे हुए यह कविता इन्सान के अंतर्मन को झकझोर के रख देगी! जिस प्रकार नालायकों कपूतों के लिए लिखा है कि, जानता हूँ कि तेरे घर में जब पार्टी होती है और बड़े बड़े रसूखदार लोग जब स्वरों के तीव्र संगुफन पे नाचते गाते हैं तो पुरानी सिलाई मशीन , बांस का पीपा और तेरी दमाग्रस्त माँ के साँसों की धौंकनी तेरे अतिविशिष्ट मेहमानों के मस्ती कि तरतीब बिगाड़ देती है और तब तू बड़ी लज्जा महसूस करता है सबके सामने! आह!! कितना दर्द है उस माँ के दिल में जिसने अपने कपूतों के लिए अपने आप को भी होम कर दिया, और उसी माँ का कपूत बेटा अपने दोस्तों के सामने अपनी जन्मदात्री को माँ कहने में लज्जा महसूस करता है! मेरी मां अक्सरहां मुझसे कहा करती है कि सब्र रख बेटा एक दिन तेरा भी वक्त आयेगा : तू भी ध्रुव तारे सा शोभित करेगा आसमां के मष्तक को, तू भी अमर किर्ती के ज्योत-पूंज सा सारे नभ में छायेगा : पर आखिर कब होगा ऐसा तब जबकि ढाढस और दिलासा देने वाली मां हीं नहीं रहेगी , तब जबकि आशाओं की बाती वाली आखिरी लौ भी जल बुझेगी: एक सपूत अपनी माँ के प्रति जो सोच, जो भाव, जो अगाध श्रद्धा अपने दिल में रहता है, वह भले ही उसे व्यक्त नहीं कर सकता, मगर आपने आपनी कविता के माध्यम से चंद शब्दों में एक सपूत के ह्रदय भावों को बड़े ही खूबसूरत अंदाज़ में व्यक्त किया है .....!!! कमीज के उस इकलौती जेब को देर तक टटोलता हुआ अधूरी कीमत हीं तलाश पाता , फिर भी कुछ और पाने की आस लिए मैं अपनी जेब को फिर एक बार टटोल जाता ; प्रयासों में डूबा शीघ्र हीं मैं चिर-परिचित उस दुकान के पास होता ‘आज नगद कल उधार’ की उस तख्ती पर मैं एक उपहास होता … उपेक्षित दृष्टियाँ मेरा स्वागत करतीं , तौल जातीं मेरी उस अधूरी कीमत पर मेरी ज़रूरतों को परन्तु रह जातीं अधूरी कीमतें फिर भी शेष...! एक बेबस, लाचार और गरीब पिता जब अपने बच्चों को भूख से बिलबिलाते देखता है तो उसके दिल पर क्या गुज़रती है, यह बात कोई उसी के समान जीवन व्यतीत करने वाला ही समझ सकता है! मगर आपकी कवितो को पढने के बाद प्रत्येक व्यक्ति उस मर्म को एक लाचार पिता के दर्द को समझ सकता है ! अत्यंत ही उत्तम और भावपूर्ण शब्दों का प्रयोग किया है आपने, हार्दिक बधाई! पवन जी जेजे पर ही मेरा "सच तो यह है" के नाम से ब्लॉग है, मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि आप थोडा सा समय निकलकर अपने इस अनुज के द्वारा लिखे गए लेखो पर एक नज़र डालें और उनमे रहने वाली कमियों से मुझे अवगत कराएँ तो मैं आपका अत्यंत आभारी रहूँगा! मधुर भारद्वाज http://madhurbhardwaj.jagranjunction.com/

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

तेरी माँ की पुरानी सिलाई-मशीन, बा की बांसूरी और उन दोनों चीजों को सहेजती तेरी बूढी विधवा माँ ;------------- उस गुज़ारे ज़माने के स्मृतिका के रूप में , घर के किसी अंधियारे गोसे में पडा रहने दे ,.... वाह तो नहीं कह सकती पवन जी .पर आह !!! कई बार उठे , संवेदनाओ को जब आप शब्दों में बुनते है वो भी नालायको के लिए ... तो कई आह अनायास ही मुह को आ गए .... ... और दर्द तारी होगया सभी माँ के लिए ..... कुंडली की टनटानाहट से चीर पाता मैं और इसलिए उन शुष्क गलों को तरने, खाली डब्बों को भरने , जेब में पड़े चंद गिन्नियों को गिन जाता मैं ; कमीज के उस इकलौती जेब को देर तक टटोलता हुआ अधूरी कीमत हीं तलाश पाता , फिर भी कुछ और पाने की आस लिए मैं अपनी जेब को फिर एक बार टटोल जाता ; प्रयासों में डूबा शीघ्र हीं मैं चिर-परिचित उस दुकान के पास होता ‘आज नगद कल उधार’ ..... बहुत सच्ची अभिवयक्ति पवन जी एक मजबूर पिता की बेबसी को आप ने बड़ी संजीदगी के साथ बयाँ किया ...इसी भाव दशा पैर मैंने लघु कथा पिछले सप्ताह लिखी है आप सब के बिच जड़ लायुंगी .. बहुत बधाइयाँ ...एक बार फिर श्रेष्ठं रचनाओ को हमारे बिच आपने लाया ....

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: sadhna sadhna

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: sadhna sadhna

जेठ की अलसायी दुपहरी में जब सब सो जाते थे और दूनियां बेगानी सी लगती थी, निकल पडता था उबड-खाबड कच्चे पगडंडियों पे दोस्त ढूंढने; मैं हार कर खुद से बतियाता था आह बचपन के उस बियावन में मैं कितना सुकून पाता था......... ----------------------------- जब अब्रे-बहार बरसेगा और जब लौटेगा बसन्ती बयार साथ शादाबी लिए ….. क्या तू भी गांव तब लौटेगा जब बया लौटेगी ? वाह बचपन के दिन भी क्या दिन थे मैंने तो आपकी कोई भी कविता पढ़े बिना नहीं छोड़ी .... इसमें से जो २ नए थे मेरे लिए ..आपकी लेखनी का जवाब नहीं आँखों में शब्द तैरने लगते है और मन वह तक पहुच पीगे मारने लगता है ..बचपन में ले जाने और स्वयं से सवाल को दायरे में रख सच्चाई से रूबरू करने के लिए ....आपका धन्यवाद

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

पवन भाई, आपने प्राकृतिक विपदा का जो सजीव दृश्य प्रस्तुत किये उसका आभार......भाई आप पवन और मैं अनिल मतलब दोनों ही वायु चलों दिनेश ( सूरज ) के साथ मिलकर एक ऐसी आंधी का निर्माण करें जो सामाजिक कुरीतियों और मानसिक प्रवृतियों को इस धरातल से उखड फेंके...... आपने जो मरी हुई मानवता का जो दृश्य प्रस्तुत किया उससे तो हम इंसानों का सर शर्म से झुक गया फिर भी मैं बेशर्म इस सजीव चित्रण पर नंगा होकर नाचना चाहता हूँ क्योंकि मुझे तो मजा आता है अपनी बेशर्मी पर शुरू ही जाइये मेरा नंगा नाच देखने के लिए ....... नाचो रे भाई नाचो रे….झूम झूम के नाचो रे , और इस भारत भूमि की महानता पर, नंगा होके नाचो रे, नाचो रे भाई नाचो रे झूम झूम के नाचो रे……हाँ……हाँ….हाँ……मजा आ गया भाई आखिर हम भारतीय अपनी महानता दिखने से बाज नहीं आयेंगे. अब तो पानी सर से ऊपर जा रहा हैं....….अरे देश भक्ति की बात करने वाले मित्र आनंद और भाई संतोष कहाँ छुपे हो… कहीं अता पता नहीं चल रहा ..आओं अपनी महानता पर नंगा नाच शुरू किया हूँ, अरे देश के और भारतीयता के गुनगाने वालों कहाँ छुपे हो…….आओं महानता का पर्व मनाना है……नाचो रे भाई नाचो रे….झूम झूम के नाचो रे ,नंगा होके नाचो रे, नाचो रे भाई नाचो रे झूम झूम के नाचो रे……हाँ……हाँ….हाँ…मजा आ रहा है….वाह…वाह..…..नंगा होके नाचो रे, नाचो रे भाई नाचो रे झूम झूम के नाचो रे……हाँ……हाँ….हाँ.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

चन्दन साहब आपने मुझे चंद सुंदर बेजोड़ 'नगीनों' में से एक कहा है या 'नागिनो' में से एक .....अगर मुझे 'नगीना' कहा है तो मैं असहमत हूँ और अगर 'नागिन' कहा है तो साहब आपने मुझे सही पहचाना ....मैं भी खुद को भुजंग मानता हूँ ..... एक तरफ भुजंग विषधर , एक तरफ मानव दर्प धर यकीन मानिये मानव दर्प मेरे विष पे भारी पड़ता है ...:)) ....वो कविता जिसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहूचना चाहिए था ,कोपभवन में कूढ़ रही है .....एक आध आप जैसे दोस्त भूले भटके आ जाते हैं उसकी खैरो बरकत पूछने .....मेरे साथ विडम्बना यह है की जब मैं कुछ बड़े निमित्त को साध कर ,कुछ नेक अभीष्ट को लक्षित कर ,कुछ all emcompassing लिखता हूँ तो ठीक उसी दीन संपादक महोदय छुट्टी पे चले जाते हैं ...तभी तो जागरण के फीचर ब्लॉग में मेरे ऐसी कविताओं को जगह नहीं मिलती ....मलाल इस बात का है की एक अच्छी बात का अच्छा प्रयोजन सिद्ध नहीं हो पाता...

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

संदीप साहब आपसे ३ बातें कहना चाहूँगा -१हला -क्रांति का मतलब होता है परिवर्तन और मेरी कविता से यह स्पष्टतः विदित है कि मैं ज़िन्दगी के सुरमई तरतीबों को न बिगड़ने देने की बात कह रहा हूँ अर्थात मैं ज़िन्दगी में किसी तरह की क्रांति नहीं चाहता हूँ ....मज़हबी क्रांति तो खास तौर पे नहीं .... प्रकृति ने क्रांति की प्रयाप्त व्यवस्था कर रक्खी है .....इंसान तो क्रांति के नाम पर बस अपने स्वार्थ को साधता रहा है ..चाहे वह स्वार्थ सूक्ष्म रूप धारण कर मन के गहरे में छिपा हो ,पर स्वार्थ होता ज़रूर है ....निज अहम् को पोषित करने का स्वार्थ ,महानता का अभीष्ट लिए स्वार्थ ..अब इस बहुरूपिये स्वार्थ के बारे में क्या बताऊँ ....२सरि बात - आपसे अपनी इस शायरी के ज़रिये कहना चाहूँगा कि - यूं अल्फाजों के बंदिशों में महदूद न करो आफ़तब को : अंधेरा गहरा है,रौनके-हयात की सख्त ज़रूरत है. और ३सरि बात यह रही :- ............................................:) :) :)

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

मुझे चार बातें कहनी है, पर तीन तो मैं कहूँगा, चौथे के बाबत चुप रह जाऊँगा......... पहली बात मैं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़  साहब की जुबान मे कहना चाहूँगा...... "ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू लेकर चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तरों की आख़री मंज़िल कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज् का साहिल कहीं तो जा के रुकेगा सफ़िना-ए-ग़म-ए-दिल जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों से चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से पुकरती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी थकन सुना है हो भी चुका है फ़िरक़-ए-ज़ुल्मत-ए-नूर सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ए-हराम जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई अभी चिराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई" दूसरी बात मैं शॉ की जुबान मे कहूँगा....... "Revolutions have never lightened the burden of tyranny. They have only shifted it to another shoulder." तीसरी बात जो मुझे कहनी है और मैं अपनी ही जुबान मे कहूँगा....... 'problem as such is never a problem,' जीवन की समस्याएँ दो प्रकार की है, एक समाजी और दूसरा व्यक्तिगत, मेरे अनुभव से सामाजिक समस्या को सीधे समाप्त नहीं किया जा सकता है, और उनसे लड़ के तो कदापि नहीं, और अगर लड़ते है तो फिर शॉ की बात सच सवित होती है, "Revolutions have never lightened the burden of tyranny. They have only shifted it to another shoulder." एक समस्या तो समाप्त कर लेते हैं हम, पर उस एक को समाप्त करते करते हैं हज़ार नई समस्याएँ पैदा कर लेते हैं......हाँ, ये बात है, जब एक जेल से दूसरे मे जा रहें होते हैं, तो एक जेल से दुसरे मे जाने मे जो समय लगता है, उस दौरान कुछ देर के लिए हम अच्छा फील कर लेते है,,,,पर अगर हमे थोड़ी समझ हो तो वो भी संभव नहीं है...........!  फतेह पुर सिकरी मे जीसस का बहुत ही प्यारा वचन खुदा हैं मुख्य द्वार पर , "ये दुनियाँ पूल की भाँति है, यहाँ अपना घर मत बनाओ, बस इस पे से हो कर गुजर जाओ" चौथी बात जो मैं कहना चाहता हूँ....... .............................................................. ..............................................................!!!

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

उधर सिर्फ घर इधर दिल टूटा ....पापा के जाने से ............ इस निकम्मी औलाद में , जाने क्या पाते थे पापा, जो इस पर मुसलसल मुहब्बत लुटाते थे पापा.... पूराने कपडे की गुडिया जैसे, पापा की इस औलाद में था हीं क्या - एक बेवकूफी भरी सोच , कुंद दिमाग , और असफलता का साया, जिसपे पापा की उम्मीदें, हर रोज़ जागा करती थी; अब पापा नहीं रहे और उस निकम्मी औलाद की देखभाल की रवायत भी नहीं रही; अब उस के चेहरे पर, तगाफुल की झुर्रियां झलक आयी हैं और पांवों में लंबी-लंबी बे पुरसाहाली की बिवाइयाँ उग आयी हैं; कभी जब उधर से गुज़रती हूं तो अज़ीब सा भ्रम होता है मुझे, कभी बाहर बरगद के नीचे गिरे सूखे पत्तों के ढेर पे किसी की पदाचाप सुनाई देती है तो कभी बरामदे में रक्खी पापा की आरामकुर्सी हिलती हुई दिखाई देती है; भ्रम तो भ्रम है , इससे आज नहीं तो कल उबर हीं जाऊँ गी मैं पर उस सवाल का क्या जो हरदम मेरे ज़ेहन में उमडता रहता है कि आखिर उस निकम्मी औलाद में ऐसी क्या सम्भावना पाते थे पापा, जो उस औलाद पर मुसलसल मुहब्बत लुटाते थे पापा ;............

के द्वारा: sinsera sinsera

पवन जी नमस्कार.. आप दोने मित्रो ने तो आज हिला कर रख दिया है......पहले तो अपना ब्लॉग खोलते ही संदीप जी नजर आये , मैं अच्छी खासी चौंक गयी... सोचा आज संदीप जी क्यों हुआ है...ये बंदा इतना गंभीर है.., हर विषय पर इतनी गहरी पैठ रखता है...आखिर माजरा क्या है.....फिर मैंने दुसरे ब्लोग्गेर्स के पेज भी देखे , आपके नही देखा , यातक की rashmi जी और तमन्ना जी के ब्लॉग में जनाब अपने उपस्थिति दर्ज कर करा चुके थे...फिर मुझे लगा लेखक , कवी तो ऐसे भी पागलो की श्रेंणी में आते है...और अप्रैल का महिना चल रहा है ..बड़े दिनों से गंभीर वार्ता कर रहे है तो आज इन्हें थोडा हल्का फुल्का मजाक करने की सूझी है....इस लिए..और ऐसे भी मैं थोड़ी ज्यादा ही उदारमना हूँ ...सोचा चलो थो कमेंट्स कर दूंगी...फिर रेअदेर ब्लॉग में देखा ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित रचना से जनाब ने कुछ डाला है....जब पड़ा तो वही कविता अजीब सा पासो पेश में पर गयी...क्योकि शीर्षक से तो जनाब ने भ्रम में डाल दिया खैर....जो मैंने लिका वो तो आप पढ़ चुके होंगे....और मैं तो अप्रैल फूल बन चूँकि हूँ :)) अब आपकी बात करते है...ये तो सच है.. की ये फिल्मो वाके हिंदी की खाते है है और हिंदी में बात करने और समझने में इन्हें अपना स्टेटस डाउन लगने लगता है...ये तो बहुत बार दोगलापन..... अत जब ये आपको हिंदी कविता की इंग्लिश में लिखने को कहते होंगे तो आपको कितनी खीझ और गुस्सा आता होगा..समझा जा सकता.है.... पर आपको निराशा किस बात है जब अओने खुद कहा की आपके गीत को नामी गायकों ने गया है और टीवी में आपको वाही मिली है...दूसरा मुक्ति बोध का सम्मान मिला आपको..... फिर इतनी जल्दीबाजी और निराशा किस लिए....धीरे धीरे और पहचान मेलेगी..साहित्य बहुत धर्य मांगता है......आपको तो बहुत खुच मिल रहा है दुसरो को तो वो भी नहीं मिलता.... पहले के लेखको तो फाका करनी parti थी पर तभी उन्होंने ने लिखना नहीं छोड़ा था...... अगर ज्यादा लिख दिया तो क्षमा करेंगे... . वो शब्द जो अनकहे थे जिसे कहना चाहा था कई बार उसने और कई बार तो चाहा था बेचना दो सूखे रोटियों के मोल पर , पर जिसे दो जोड़े कान न मिल सके दाम कैसे मिलते … बहुत अच्छी प्रस्तुति....बहुत बधाई....aapko

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ..........आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार... यह खेल चले दो तीन महीने लगातार.... फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार..... डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार..... फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार...... तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार.....

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

महिमा जी आपके बेशकीमती तारीफ के लिए तहे दिल से शुक्रिया ....मैं इस बात से भली भांति अवगत था की कविता का शीर्षक हल्का है पर बावजूद इसके मैंने शीर्षक वही रक्खा क्यूंकि एक और कटु सत्य है कि ऐसा ही उच्श्रीन्खल शीर्षक पाठकों को मेरे साहित्यिक दालान तक खींच कर लाएगा ....एक और आत्मस्वीकारोक्ति मेरी -जी हाँ मैं इस ब्लाग में अपनी कविता लोगों तक पहुचाने के लिए लिखता हूँ ....अब इसे आप मेरा स्वार्थ-शिक्त व्यवहार समझिये या हिंदी को लोकप्रिय बनाने की मुहीम ....मैं टीवी सीरियल और फिल्मो के लिए गाने ,स्क्रीनप्ले वगैरह लिखता हूँ जहाँ भाषाई माध्यम हिंदी है पर विडम्बना देखिये वहां मुझे ये सारी चीजें इंग्लिश में लिखनी पड़ती है ....लोग हिंदी को भूना रहे हैं ...हिंदी की खा रहे हैं पर हिंदी को इज्ज़त नहीं बख्श रहे ....मेरी दिली ख्वाइश है की हिंदी/उर्दू से लोग प्यार करें ...उसे इज्ज़त दें और वह तब ही मुमकिन है जब हम आप जैसे लोगों को लोग सुन सकें ....और अपने इस अभीष्ट की सिद्धि के लिए उन्हें चारा तो डालना ही होगा न .

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

राजीव  जी ! तरीफ़ के लिये शुक्रिया .जहां तक मैंने औरतों को समझा है ,औरतें अतिवादी होती हैं,पुरुषों के तरह साम्यवादी नहीं ....हमेंशा दो विपरित धूरियों के पराकाष्ठा पर -अच्छीं तो बहुत अच्छीं और बुरीं तो बहुत बुरीं....अगर पुरूषों के ब्लाग में सुखाड और स्त्रियों के ब्लाग में बसन्त-बहार दिखती है तो इसके लिए ज़िम्मेवार है- पुरूषों का चाटुकारी स्वाभाव .....पुरूष तहरीर के मौज़ू पे कम और औरतों के दिलकश चेहरे को जब ज्यादा तवज्जो देते हैं तो न केवल वे अपने भाईयों के साथ ज़्यादीती करते हैं बल्कि औरतों का भी नुक्सान करते हैं..वे औरतों के बाह्य सौन्दर्य से अभीभूत होकर जब उनका स्तुती-गान करते हैं,उनपे कसिदे पढते हैं तो बेचारी औरतें आत्म-मुग्धीकरण के बाडे में महदूद होकर रह जाती हैं.......उन्हें खुद के अनूप और अलौकिक होने का मिथ्याभान होने लगता है ....और तब वे अपनी सारी विन्रमता बिसरा खुद को पुरुषों से इतर या यूं कहें श्रेष्ठतर समझने लगती हैं ......वैसी औरतें जो वस्तिविकता में गुण-सम्पन्न हों ऐसा सोंचे तो समझ में आता है पर इस भ्रम का शिकार तो वैसी औरतें भी हो जाती हैं जिनके पास रूप-माणिक के अलावा अन्य कोई आभूषण नहीं .... ऐसा नहीं कि मैं औरतें के प्रति किसी तरह के दुराग्रह से ग्रसित हूं ....मैं तो पुरुषों को भी स्वाभाव से लम्पट मानता हूं और यह मानता हूं कि प्रकृति ने स्त्री की अभिव्यंजना इसलिए की है ताकि वो अपने मृदुलता से पुरुषों की लम्पटता कम कर सके पर अगर स्त्री भी लम्पट हो जाए तो स्थैतिक संतूलन तो गडबडा हीं जाएगा न ? एक और धूर सत्य है कि लेखक स्वभावत: अहंकारी होते हैं ....वे अपने लेखन के माध्यम से अपने विचारों का उदगार कम और अपने अहम की तुष्टी ज्यादा ढूंढते हैं और अगर किसी ने उनकी जरा भी आलोचना कर दी तो देखिये उनकी छटपटाहट ....और वो लेखक गलती से अगर एक औरत निकलीं तो फ़िर क्या कहने ......विषधर भुजंग भी ऐसा क्या विष वमन करेगा जो वो करती हैं.

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava




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